कोलकाता मेट्रो ने ग्रीन लाइन को स्वायत्त (ड्राइवरलेस) संचालन के लिए मंजूरी प्राप्त कर ली है, जबकि पर्पल लाइन को भी भविष्य में इसी तकनीक से लैस किया जाएगा। यह कदम दिल्ली और बेंगलुरु के बाद शहर को भारत के प्रमुख स्वचालित मेट्रो नेटवर्क में जोड़ता है।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- कोलकाता मेट्रो की ग्रीन लाइन को ड्राइवरलेस संचालन की मंजूरी मिली
- पर्पल लाइन में भी भविष्य में समान तकनीक लागू होगी
- ऑरेंज लाइन के 18‑महीने के ट्रैफिक जाम का समाधान पूरा हुआ
कोलकाता मेट्रो आधिकारिक तौर पर भारत के उन शहरों में शामिल हो गया है जहाँ ट्रेनों को बिना ड्राइवर के चलाया जाता है। रेलवे सुरक्षा आयुक्त (CRS) ने ग्रीन लाइन (पूर्व‑पश्चिम कॉरिडोर) को स्वायत्त संचालन की अनुमति दी है, जो हावड़ा मैदान से सॉल्ट लेक सेक्टर‑V तक फैली हुई है। भविष्य में पर्पल लाइन को भी इसी तकनीक से सुसज्जित करने की योजना है, हालांकि स्पष्ट समय‑सीमा अभी तय नहीं हुई है।
पृष्ठभूमि और महत्व
दिल्ली मेट्रो ने पहले ही मैजेंटा और पिंक लाइनों पर ग्रेड ऑफ ऑटोमेशन‑4 (GoA‑4) तकनीक अपनाई हुई है, जिससे कोच में कोई स्टाफ नहीं रहता। बेंगलुरु की येलो लाइन भी समान स्तर की स्वायत्तता का लाभ ले रही है। कोलकाता की यह पहल न केवल शहर के सार्वजनिक परिवहन को आधुनिक बनाती है, बल्कि पर्यावरणीय लाभ भी देती है—इलेक्ट्रिक, स्वायत्त ट्रेनों के कारण ऊर्जा दक्षता में सुधार और कार्बन उत्सर्जन में कमी आती है।
तकनीकी ढांचा और सुरक्षा उपाय
ड्राइवरलेस ट्रेनों को चलाने के लिए आवश्यक बुनियादी ढांचा सीबीटीसी (Communication‑Based Train Control) प्रणाली है, जो वास्तविक‑समय डेटा के आधार पर ट्रेनों को नियंत्रित करती है। कोलकाता मेट्रो की दो मौजूदा लाइनों में से केवल ईस्ट‑वेस्ट (ग्रीन) लाइन इस प्रणाली से लैस है। सुरक्षा के लिहाज से प्लेटफ़ॉर्म स्क्रीन डोर (PSD) स्थापित किए गए हैं, जो ट्रेन के पूरी तरह स्थिर होने पर ही खुले होते हैं, जिससे ट्रैक पर गिरने की संभावना समाप्त हो जाती है। इसके अतिरिक्त, ट्रेन के आगे लगे ऑप्टिकल सेंसर और फिज़िकल बार किसी भी छोटे वस्तु को पहचानते ही आपातकालीन ब्रेक को सक्रिय कर देते हैं।
ऑरेंज लाइन की प्रगति
एक और महत्वपूर्ण विकास ऑरेंज लाइन (लाइन‑6) में हुआ है। लगभग 18 महीनों तक ट्रैफ़िक ब्लॉकिंग के कारण कार्य रुकाव में था, लेकिन अब रेल विकास निगम (RVNL) ने ईएम बायपास पर पिलर 317‑319 के बीच आवश्यक गिर्डर सफलतापूर्वक रखे हैं। इस प्रोजेक्ट की पूर्णता ने शहर के प्रमुख ट्रैफ़िक बोतलनेक को हटाया है, जिससे भविष्य में लाइन‑6 के विस्तार और संचालन की राह आसान हुई है।
भविष्य की दिशा
ड्राइवरलेस तकनीक के सफल कार्यान्वयन से कोलकाता मेट्रो को अन्य भारतीय शहरों के लिए मॉडल बनना चाहिए। विशेषज्ञों का मानना है कि जैसे-जैसे शहरों में जनसंख्या बढ़ेगी, स्वचालित प्रणाली भी सार्वजनिक परिवहन की क्षमता और विश्वसनीयता को बढ़ाएगी। साथ ही, यह तकनीक निजी‑सार्वजनिक साझेदारी, निवेश एवं रोजगार के नए अवसर भी उत्पन्न करेगी।