लोकसभा में दिसम्बर 2025 में पेश किया गया VBSA बिल, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, AICTE और NCTE को मिलाकर एक ही नियामक बनाता है। संसद के संयुक्त समिति ने इस प्रावधान को संस्थागत स्वायत्तता के लिए जोखिम मानते हुए चेतावनी दी है।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- विकसित भारत शैक्षिक अधिनियम 2025 एकल नियामक बनाकर मौजूदा नियामक निकायों को समाप्त करता है।
- संयुक्त समिति ने शक्ति के केंद्रीकरण से संस्थागत स्वायत्तता पर संभावित प्रभाव को उजागर किया।
- ग्रेडेड दंड प्रणाली को मनमाने ढंग से लागू करने से रोकने के लिए स्पष्ट नियमों की आवश्यकता है।
लोकसभा में दिसम्बर 2025 में पेश किया गया विकसित भारत शिक्षा अधिनियम (VBSA) 2025, भारत के उच्च शिक्षा परिदृश्य में एक विशाल बदलाव का लक्ष्य रखता है। इस बिल के तहत विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC), ऑल इंडिया काउंसिल फॉर टेक्निकल एजुकेशन (AICTE) और राष्ट्रीय शिक्षक शिक्षा परिषद (NCTE) को समाप्त कर एक एकीकृत नियामक आयोग स्थापित किया जाएगा। यह प्रस्ताव राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के कार्यान्वयन के साथ संरेखित है, जिसमें शिक्षा के तीन मुख्य पहलुओं – नियमन, मान्यकरण और मानक – के लिए विशेष परिषदों की व्यवस्था की गई है।
संयुक्त समिति की प्रमुख चिंताएँ
बिल को संसद की संयुक्त समिति द्वारा समीक्षा के बाद यह नोट किया गया कि एकल नियामक में व्यापक नियामक शक्ति का केंद्रीकरण, यदि सही ढंग से नियंत्रित न किया गया तो, नौकरशाही या वैचारिक अतिक्रमण का कारण बन सकता है। इस प्रकार की शक्ति के समेकन से मौजूदा UGC ढाँचे द्वारा प्रदान की गई संस्थागत स्वायत्तता खतरे में पड़ सकती है। समिति ने यह भी कहा कि ग्रेडेड दंड संरचना को मनमाने ढंग से लागू नहीं किया जा सकता, बल्कि इसे सिद्ध उल्लंघनों के आधार पर ही लागू किया जाना चाहिए।
दंड प्रणाली और जवाबदेही
बिल में प्रस्तावित ग्रेडेड दंड प्रणाली का उद्देश्य लगातार नियमों का उल्लंघन करने वाले संस्थानों को रोकना है। समिति ने इस बात पर ज़ोर दिया कि दंड केवल प्रमाणित उल्लंघनों पर ही लगना चाहिए, जिससे संस्थागत जवाबदेही को सुदृढ़ किया जा सके। साथ ही, यह प्रणाली “कॉरपोरेट वील” को हटाकर धोखाधड़ी वाले संस्थानों के प्रमोटरों को उजागर करने की दिशा में काम करेगी। वैध उच्च शिक्षा संस्थानों के लिए भी बार‑बार उल्लंघन करने पर व्यक्तिगत जिम्मेदारियों को बढ़ाया जाएगा, जिससे शैक्षणिक नेतृत्व पर अधिक दबाव आएगा।
नियुक्ति प्रक्रिया में सुधार की सिफारिशें
संघीय सरकार को यह सुझाव दिया गया कि भविष्य में होने वाले रिक्तियों, जैसे सेवानिवृत्ति या सुपरऐन्यूएशन, को कम से कम छह महीने पहले पहचाना जाए और 90 दिनों के भीतर भर दिया जाए। इसके अलावा, आयोग के अध्यक्ष एवं पूर्ण‑कालिक सदस्यों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जानी चाहिए, जबकि अन्य सदस्यों की नियुक्ति के लिए केंद्रीय सरकार की भूमिका को तेज़ करने की सिफारिश की गई।
भविष्य की दिशा
यदि VBSA बिल पारित हो जाता है, तो यह भारत के उच्च शिक्षा प्रणाली में सबसे बड़ा संरचनात्मक परिवर्तन होगा। यह परिवर्तन शिक्षा की गुणवत्ता, पहुँच और अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा को प्रभावित कर सकता है। हालांकि, शक्ति के अत्यधिक केंद्रीकरण से उत्पन्न संभावित जोखिमों को कम करने के लिए पारदर्शी कार्यप्रणाली, स्पष्ट दंड मानदंड और समयबद्ध नियुक्ति प्रक्रिया अनिवार्य होगी।