तेलंगाना के प्रसिद्ध वस्त्र नगर सिरकिला के बुनकर ने एक अनोखी रेशमी साड़ी बनाई, जो 5.5 मीटर लंबी है लेकिन मरोड़ कर मैचबॉक्स में फिट हो जाती है। यह साड़ी देवी भैराम्बा के सामने सृष्टि सैलाम मंदिर में प्रदर्शित की गई, जिससे हाथloom कला की महत्ता उजागर हुई।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • सिर्किला के बुनकर ने 5.5 मीटर लंबी रेशमी साड़ी को मैचबॉक्स में फिट किया।
  • साड़ी में पारंपरिक इकट पैटर्न है और वजन केवल 200 ग्राम है।
  • यह अनोखा वस्त्र देवी भैराम्बा को सृष्टि सैलाम में प्रस्तुत किया गया, जिससे हाथकढ़ाई कला की महत्ता उजागर हुई।

तेलंगाना के वस्त्र‑शहर सिरकिला की हाथloom परम्परा को नया आयाम मिला है, जब बुनकर एन विजय कुमार ने एक ऐसी रेशमी साड़ी तैयार की जो एक सामान्य मैचबॉक्स में आराम से रखी जा सकती है। लगभग एक सप्ताह की मेहनत के बाद तैयार हुई यह साड़ी 5.5 मीटर लंबी, 48 इंच चौड़ी और केवल 200 ग्राम वजन वाली है।

इकट पैटर्न की परम्परा

साड़ी को पारंपरिक “इकट” पैटर्न में बुनाया गया है, जो दक्षिण‑पूर्वी भारत में सदियों से चलती आ रही बुनाई तकनीक है। इकट में धागे को पहले रंगीन किया जाता है और फिर धागे को बुनाई में उपयोग किया जाता है, जिससे जटिल जियोमेट्रिक डिज़ाइन बनते हैं। यह कला न केवल सौंदर्य की दृष्टि से आकर्षक है, बल्कि धैर्य और कुशलता की परीक्षा भी है।

देवी भैराम्बा को भेंट

जुलाई 14, 2026 को सृष्टि सैलाम मंदिर में बुनकर ने यह अद्भुत साड़ी देवी भैराम्बा को समर्पित की। इस अवसर पर मंदिर ट्रस्ट बोर्ड के अध्यक्ष पी रामेश नायडु ने साड़ी को स्वीकार किया और बुनकर के कौशल की सराहना की। साथ ही बोर्ड के सदस्य कोडें कांतिवर्धिनी ने भी इस ऐतिहासिक क्षण को देखा।

हाथloom का सांस्कृतिक महत्व

रामेश नायडु ने कहा कि हाथloom केवल एक पेशा नहीं, बल्कि पीढ़ी‑दर‑पीढ़ी हस्तांतरित होने वाली कला है। उन्होंने सभी को हाथloom उत्पादों का समर्थन करने और इस धरोहर को संरक्षित करने का आह्वान किया। इस प्रकार की भेंट न केवल धार्मिक भावना को दर्शाती है, बल्कि स्थानीय कारीगरों के आत्मविश्वास को भी बढ़ाती है।

भविष्य की दिशा

ऐसे नवाचारी प्रयासों से हाथloom उद्योग को नई पहचान मिल रही है। जब कारीगर तकनीकी सीमाओं को पार कर ऐसे अद्वितीय वस्त्र बनाते हैं, तो राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय हाथloom की मांग बढ़ती है। इस प्रकार की पहल न केवल संस्कृति को सहेजती है, बल्कि आर्थिक रूप से भी कारीगरों को सशक्त बनाती है।