कर्नाटक संस्कृति आयोग ने राज्यगीत ‘नाडागीत’ में ‘बौद्ध’ शब्द जोड़ने की सिफ़ारिश की। यह प्रस्ताव कविम कुवेम्पु के मूल मसौदे पर आधारित है और अब कर्नाटक विकास प्राधिकरण की मंज़ूरी का इंतज़ार है।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- कर्नाटक के उच्चस्तरीय आयोग ने नाडागीत में ‘बौद्ध’ शब्द जोड़ने की एकमत सिफ़ारिश की।
- यह बदलाव कवि कुवेम्पु के 1924‑25 के मूल मसौदे के अनुरूप है।
- आयोग ने पुष्टि की कि दो अक्षर जोड़ने से गीत की लय या अवधि पर असर नहीं पड़ेगा।
कर्नाटक संस्कृति विभाग द्वारा गठित एक उच्चस्तरीय समिति ने राज्य के आधिकारिक गीत ‘नाडागीत’ में शब्द “बौद्ध” को पुनः सम्मिलित करने की एकमत सिफ़ारिश की। यह प्रस्ताव सोमवार को विभाग को प्रस्तुत किया गया और अब कर्नाटक विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष पृष्ठोत्तम बिलिमाले के अनुसार अंतिम निर्णय का इंतज़ार है।
कुवेम्पु के मूल मसौदे से जुड़ी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
राज्यगीत के मूल लेखन में कवि कुवेम्पु (कुप्पाली वेंकट पुट्टप्पा) ने 1924‑25 में “पारसिक जैन बौद्ध” शब्द शामिल किया था। 1930 में उनके ‘कोलालु’ संग्रह में प्रकाशित होने पर यह शब्द हटाकर “जैन” रखा गया। कुवेम्पु ने जीवन भर बौद्ध धर्म को उच्च सम्मान दिया था, इसलिए कई साहित्यिक विशेषज्ञों का मानना है कि इस शब्द को पुनर्स्थापित करना उनके मूल इरादे के अनुरूप होगा।
आयोग की विस्तृत जांच और निष्कर्ष
आठ सदस्यीय समिति, जिसमें हंम्पा नगराजैया, एसजी सिद्धरामैया, केवी चिदानंद, आशा देवी आदि शामिल थे, ने लगभग दो घंटे की चर्चा के बाद यह निष्कर्ष निकाला कि “बौद्ध” शब्द जोड़ने से गीत की लय में कोई बाधा नहीं आएगी। उन्होंने बताया कि दो अक्षर जोड़ने से केवल कुछ मिलीसेकंड का अंतर होगा, जो गायक स्वाभाविक रूप से लम्बी स्वर को खींचते हैं, इसलिए गीत की समग्र ध्वनि अपरिवर्तित रहेगी।
राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव
यह प्रस्ताव पहले 2025 में पूर्व मंत्री एच.सी. महादेवप्पा द्वारा मुख्यमंत्री सिद्धरामैया को लिखे पत्र से उत्पन्न हुआ था। यदि सरकार इस सिफ़ारिश को स्वीकृति देती है, तो यह राज्य के बहु-धर्मीय इतिहास को मान्यता देने का एक प्रतीक बन सकता है और कुवेम्पु के साहित्यिक विरासत को सटीक रूप से प्रस्तुत करेगा। दूसरी ओर, विरोधी दलों की संभावित प्रतिक्रिया और सार्वजनिक प्रतिक्रिया को देखते हुए, यह कदम कर्नाटक की सांस्कृतिक नीति में नई बहस को जन्म दे सकता है।
आगे का रास्ता
आयोग ने अपनी सिफ़ारिश विभाग को भेज दी है, और अब अंतिम निर्णय कर्नाटक विकास प्राधिकरण के हाथ में है। चाहे सरकार इस प्रस्ताव को मंज़ूर करे या न करे, यह मामला कर्नाटक के सांस्कृतिक परिदृश्य में एक महत्वपूर्ण मोड़ को दर्शाता है, जहाँ इतिहास, साहित्य और सामाजिक समरसता का तालमेल परीक्षण में है।