जम्मू‑कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने केंद्र सरकार की अयोग्य प्रतिक्रिया की आलोचना करते हुए, सोनम वांगचुक के अनशन को अन्ना हजारे के आंदोलन से तुलना की, और भाजपा को संवेदनहीन कहा।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- उमर अब्दुल्ला ने BJP की नीतियों को ‘पूर्ण संवेदनहीनता’ कहा
- सोनम वांगचुक का अनशन NEET परीक्षा घोटाले के खिलाफ है
- भाजपा की प्रतिक्रिया की तुलना अन्ना हजारे के 2011 के आंदोलन से की गई
सोनम वांगचुक, एक सामाजिक कार्यकर्ता और शैक्षणिक सुधारक, ने राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा (NEET) में हुए कथित घोटाले के विरोध में दिल्ली में अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू की है। उनका लक्ष्य है शिक्षा मंत्रालय के प्रमुख को पद से हटाना और परीक्षा में शामिल सभी धोखाधड़ी को उजागर करना। पिछले तीन हफ़्तों में वांगचुक का वजन 9 किलोग्राम से अधिक घट चुका है, जिससे उनकी स्वास्थ्य स्थिति गंभीर हो गई है।
उमर अब्दुल्ला की तीखी आलोचना
जम्मू‑कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म X पर एक पोस्ट साझा करके केंद्र सरकार की “पूर्ण संवेदनहीनता” की ओर इशारा किया। उन्होंने कहा कि मनमोहन सिंह की सरकार ने अन्ना हजारे से मिलकर उनके अनशन को तोड़ने का अनुरोध किया था, जबकि वर्तमान BJP सरकार वांगचुक की स्थिति पर कोई बयान देने की भी परवाह नहीं कर रही। इस तुलना से उमर ने यह जताया कि वह राष्ट्रीय स्तर पर भी भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की परंपरा को याद दिला रहे हैं।
केन्द्र सरकार की प्रतिक्रिया
अब तक केंद्र या शिक्षा मंत्रालय ने वांगचुक के अनशन या उमर के बयान पर कोई औपचारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है। हाई कोर्ट में दायर याचिका में तत्काल चिकित्सीय हस्तक्षेप की मांग की गई है, जिसमें जबरन भोजन (force‑feeding) की संभावना भी शामिल है। इस मौन को विपक्षी दलों ने राजनीतिक असहिष्णुता के रूप में उजागर कर दिया है, जबकि सरकार ने इसे “सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया” के रूप में खारिज किया है।
राजनीतिक परिप्रेक्ष्य
उमर अब्दुल्ला का यह बयान केवल वांगचुक के स्वास्थ्य के प्रति चिंता नहीं, बल्कि जम्मू‑कश्मीर में भाजपा की घटती लोकप्रियता का संकेत भी है। 2019 में अनुच्छेद 370 के रद्द होने के बाद राज्य‑स्तर पर कई विरोधी आवाज़ें उठी हैं, और इस प्रकार के सार्वजनिक बयान स्थानीय समर्थन को फिर से जुटाने की रणनीति के रूप में देखे जा सकते हैं। साथ ही, यह बयान राष्ट्रीय राजनीति में भी BJP के ‘संवेदनहीन’ छवि को चुनौती देता है, खासकर जब सार्वजनिक स्वास्थ्य और शिक्षा सुधार जैसे संवेदनशील मुद्दे सामने हैं।
भविष्य की सम्भावनाएँ
यदि केंद्र तुरंत कार्रवाई नहीं करता, तो यह मुद्दा राष्ट्रीय स्तर पर विस्तारित हो सकता है, जिससे विपक्षी पार्टियों द्वारा सरकार पर दबाव बढ़ेगा। स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने पहले ही चेतावनी दी है कि अनशन जारी रहने पर वांगचुक का जीवन जोखिम में पड़ सकता है, जिससे सार्वजनिक संवेदना और भी तीव्र हो सकती है। इस परिदृश्य में, भाजपा को या तो सक्रिय कदम उठाकर अनशन को समाप्त करने की दिशा में काम करना पड़ेगा, या फिर इस मुद्दे को राजनीतिक बहस में बदल कर अपनी नीतियों को बचाना पड़ेगा।