17 जुलाई, 1986 के ऐतिहासिक दस्तावेजों पर एक नजर, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने स्वैच्छिक समान नागरिक संहिता (UCC) विधेयक तैयार होने की घोषणा की थी। यह दौर सुमदोरोंग चू घाटी में चीनी घुसपैठ और अमेरिका-पाकिस्तान परमाणु साठगांठ जैसे गंभीर भू-राजनीतिक घटनाक्रमों का भी गवाह था।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने घोषणा की थी कि स्वैच्छिक समान नागरिक संहिता (UCC) का मसौदा पूरी तरह तैयार है।
- चीन ने पूर्वी क्षेत्र की सुमदोरोंग चू घाटी में सैन्य घुसपैठ के भारत के कड़े विरोध को 'अनुचित' बताते हुए खारिज कर दिया था।
- अमेरिकी प्रशासन ने सीआईए की खुफिया रिपोर्टों को दरकिनार कर दावा किया था कि पाकिस्तान के पास परमाणु बम नहीं है।
17 जुलाई, 1986 को संसद के मानसून सत्र की पूर्व संध्या पर विपक्ष के नेताओं के साथ एक उच्च स्तरीय बैठक के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने एक बड़ा ऐलान किया था। उन्होंने खुलासा किया था कि सरकार एक स्वैच्छिक समान नागरिक संहिता (UCC) का मसौदा तैयार कर चुकी है। यह घोषणा 1985 के ऐतिहासिक शाह बानो मामले के फैसले के बाद देश में उपजे भारी राजनीतिक और सामाजिक विवाद के बीच हुई थी। हालांकि, राजीव गांधी ने इस विधेयक को संसद में पेश करने की कोई निश्चित समय-सीमा तय नहीं की थी, लेकिन इस कदम ने भारतीय राजनीति में सुधार और तुष्टिकरण के बीच संतुलन बनाने की कोशिशों को उजागर किया था।
भारत-चीन सीमा पर सैन्य गतिरोध
उसी समय, भारत की उत्तरी सीमा पर भू-राजनीतिक तनाव चरम पर था। बीजिंग ने पूर्वी क्षेत्र (अरुणाचल प्रदेश) के सुमदोरोंग चू घाटी में चीनी सैनिकों की घुसपैठ पर भारत के कड़े विरोध को 'अनुचित' बताते हुए खारिज कर दिया था। चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने दावा किया था कि यह क्षेत्र हमेशा से चीनी क्षेत्र का हिस्सा रहा है और वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) के चीनी हिस्से में स्थित है। सुमदोरोंग चू का यह सैन्य गतिरोध आगे चलकर दोनों देशों के बीच बड़े सैन्य जमावड़े और भारत के 'ऑपरेशन चेकरबोर्ड' का कारण बना, जिसने दोनों देशों के राजनयिक संबंधों की परीक्षा ली।
श्रीलंका का जातीय संकट और क्षेत्रीय कूटनीति
दक्षिण एशिया के क्षेत्रीय परिदृश्य में, श्रीलंका का जातीय संकट भी गहराया हुआ था। तमिल यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट (TULF) के प्रतिनिधिमंडल और श्रीलंका सरकार के बीच वार्ता के बाद, कोलंबो भूमि बंदोबस्त के विवादित मुद्दे पर अपने प्रस्तावों को फिर से तैयार करने पर सहमत हुआ था। टीयूएलएफ के महासचिव ए. अमिरथलिंगम ने भूमि बंदोबस्त पर सरकार के प्रस्तावों के 'अनुलग्नक सी' (Annexure C) पर चर्चा की थी, जो अंततः 1987 के ऐतिहासिक भारत-श्रीलंका समझौते की पृष्ठभूमि बना।
अमेरिका-पाकिस्तान परमाणु साठगांठ
भारत की सुरक्षा चिंताओं को बढ़ाते हुए, अमेरिकी प्रशासन लगातार पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम पर पर्दा डाल रहा था। अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए (CIA) की उन रिपोर्टों के बावजूद, जिनमें कहा गया था कि पाकिस्तान कहूटा संयंत्र में 5 प्रतिशत की सीमा से अधिक यूरेनियम संवर्धित कर चुका है और परमाणु हथियार बनाने के बेहद करीब है, वाशिंगटन ने दावा किया था कि पाकिस्तान के पास परमाणु बम नहीं है। यह रुख तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन द्वारा पाकिस्तान को दी जा रही 3.2 बिलियन डॉलर की सहायता राशि को जारी रखने के लिए एक रणनीतिक मजबूरी थी, जिसका उपयोग सोवियत संघ के खिलाफ अफगान मुजाहिदीन को वित्तपोषित करने के लिए किया जा रहा था।
इतिहास का वर्तमान पर प्रभाव
चार दशक पहले की ये घटनाएं दर्शाती हैं कि भारत के सामने आज भी वही चुनौतियां खड़ी हैं जो 1980 के दशक में थीं। समान नागरिक संहिता पर जारी बहस, चीन के साथ सीमा विवाद, और परमाणु प्रसार पर वैश्विक शक्तियों का दोहरा रवैया आज भी भारतीय विदेश नीति और आंतरिक राजनीति को प्रभावित कर रहा है। इतिहास के ये पन्ने याद दिलाते हैं कि अतीत में लिए गए नीतिगत फैसले किस तरह वर्तमान को आकार देते हैं।