हैदराबाद जिले में विशेष तीव्र पुनरावृत्ति (SIR) के तहत 100% फॉर्म वितरण का दावै अधिकारियों की रिपोर्ट में दिखता है, जबकि ऑन‑ग्राउंड रिपोर्टें विसंगतियों की ओर इशारा करती हैं। कई बूथ लेवल अधिकारियों ने घर‑घर जाकर फॉर्म नहीं वितरित किए, जिससे आँकड़े पर भरोसा कम हो रहा है।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • हैदराबाद में 100% फॉर्म वितरण का आंकड़ा वास्तविकता से मेल नहीं खाता।
  • कई बूथ स्तर अधिकारी (BLO) ने घर‑घर जाकर फॉर्म नहीं वितरित किए।
  • समीक्षा प्रक्रिया में आंकड़ों को बढ़ा‑चढ़ा कर पेश करने की संभावना बनी हुई है।

हैदराबाद जिला निर्वाचन अधिकारी और ग्रेटर हैदराबाद नगर निगम के आयुक्त आर.वी. कर्नन ने बताया कि प्रत्येक बूथ लेवल अधिकारी (BLO) को पिछले 20 दिनों में कम से कम एक बार घर‑घर जाकर फॉर्म वितरित करना अनिवार्य था। लेकिन फील्ड रिपोर्टें इस बात से विपरीत हैं कि कई BLO ने स्कूल मैदान, रेजिडेंट वेलफ़ेयर एसोसिएशन (RWA) कार्यालय और सामुदायिक हॉल जैसी सार्वजनिक जगहों पर फॉर्म रखे और मतदाता को स्वयं जाकर लेने को कहा।

पृष्ठभूमि और प्रक्रिया

विशेष तीव्र पुनरावृत्ति (SIR) का उद्देश्य मौजूदा मतदाता सूची को अद्यतन करना, मृत, अनुपस्थित या स्थानांतरित मतदाताओं को हटाना और नई प्रविष्टियों को जोड़ना है। इस प्रक्रिया में प्रत्येक घर से फॉर्म एकत्रित किया जाता है, जिसे बाद में स्कैन करके इलेक्ट्रॉनिक प्रणाली में दर्ज किया जाता है। सामान्यतः, 100% वितरण का दावा तभी संभव होता है जब सभी 15 हैदराबाद निर्वाचन क्षेत्रों में प्रत्येक घर से फॉर्म मिल जाए।

वास्तविकता बनाम आँकड़े

स्रोतों के अनुसार, कई BLO ने घर‑घर जाकर फॉर्म नहीं वितरित किए, फिर भी रिपोर्टों में 100% वितरण दिखाया गया। एक अनाम अधिकारी ने बताया, “मैंने 100% वितरण रिपोर्ट की, लेकिन मेरे पास 20% फॉर्म अभी भी अनवितरित हैं।” यह बताता है कि आंकड़ों को वास्तविकता से अधिक दिखाने के लिए आंकड़े बढ़ा‑चढ़ा कर दर्ज किए जा रहे हैं।

प्रशासनिक दबाव और संभावित दंड

कर्नन आयुक्त ने कई सहायक निर्वाचन पंजीकरण अधिकारियों (AEROs) को निलंबित किया और धीमी प्रगति पर शोकेज़ नोटिस जारी किए हैं। यह दर्शाता है कि उच्च अधिकारियों से आने वाला दबाव स्थानीय स्तर पर आंकड़ों को फिक्स करने की प्रेरणा बन रहा है।

भविष्य की संभावनाएँ

यदि यह प्रवृत्ति जारी रही तो मतदाता सूची की विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्न उठेंगे, जिससे आगामी चुनावों में वैधता और भरोसा दोनों ही खतरे में पड़ सकते हैं। स्वतंत्र पर्यवेक्षक और नागरिक समाज को इस प्रक्रिया की पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए त्वरित कदम उठाने चाहिए।