कर्नाटक हाई कोर्ट ने शिवशंकरप्पा एस. सहुकर द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई को 15 जुलाई तक स्थगित कर दी। अदालत गवर्नर के अनुच्छेद 317(2) के तहत KPSC अध्यक्ष को निलंबित करने के अधिकार की स्पष्टता चाह रही है।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- Karnataka हाई कोर्ट ने सुनवाई 15 जुलाई तक टाल दी
- गवर्नर के अनुच्छेद 317(2) के अधिकार पर सवाल उठे
- सहुकर के निलंबन के पीछे पक्षपात और अनैतिकता के आरोप
बेंगलुरु—कर्नाटक हाई कोर्ट ने मंगलवार को शिवशंकरप्पा एस. सहुकर की याचिका पर सुनवाई को 15 जुलाई तक स्थगित कर दी, जिसमें उन्होंने कर्नाटक सार्वजनिक सेवा आयोग (KPSC) के अध्यक्ष के रूप में अपने निलंबन की वैधता को चुनौती दी है। न्यायाधीश सूरज गोविंदराज ने इस फैसले को इसलिए टाला क्योंकि उन्हें अनुच्छेद 317(2) के तहत गवर्नर के निलंबन अधिकार की व्याख्या स्पष्ट करनी है।
संवैधानिक पृष्ठभूमि
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 317(1) और (2) राज्य सार्वजनिक सेवा आयोग (SPSC) के सदस्यों के चयन और निलंबन की प्रक्रिया को नियंत्रित करते हैं। उच्च न्यायालय ने 2017 के एक महत्वपूर्ण फैसले में तब गवर्नर हंसराज भड़वाज द्वारा KPSC के सदस्य मेंंगला श्रीधर को निलंबित करने की कार्रवाई को रद्द कर दिया था, क्योंकि उस समय राष्ट्रपति की मंजूरी और सुप्रीम कोर्ट की जांच अभी शेष थी। वहीं 2007 के एक अन्य निर्णय में महाराष्ट्र सार्वजनिक सेवा आयोग के सदस्य के निलंबन को वैध माना गया था, जिससे गवर्नर की अधिकारिता पर दोहरी व्याख्याएँ उत्पन्न हुईं।
सहुकर के खिलाफ आरोप
गवर्नर के सचिवालय ने सोमवार को जारी एक संचार में कहा कि KPSC के अध्यक्ष ने अपनी दो बेटियों को अवैध रूप से औद्योगिक विस्तार अधिकारी (Industrial Extension Officer) के पदों के लिए नियुक्त किया। यह भी कहा गया कि एक बेटी ने आय एवं जाति प्रमाणपत्र में गलत जानकारी दी, जिससे उसे OBC आरक्षण और क्रीमी लेयर छूट मिली। राज्य सरकार के 2002 के आदेश के अनुसार, सार्वजनिक सेवा आयोग के अध्यक्ष के बच्चों को पिछड़ी वर्ग (OBC) आरक्षण का लाभ नहीं मिलना चाहिए। यह तथ्य गवर्नर के सचिवालय ने नैतिक उल्लंघन के रूप में पेश किया।
भविष्य की संभावनाएँ
अदालती सुनवाई के स्थगित होने के बाद, दोनों पक्ष—सहुकर और कर्नाटक गवर्नर—सुप्रीम कोर्ट के संबंधित निर्णयों का विस्तृत अध्ययन करेंगे। यदि अदालत गवर्नर के अधिकार को सीमित करती है, तो यह राज्य स्तर पर सार्वजनिक सेवा आयोग की स्वायत्तता और पारदर्शिता को मजबूत कर सकता है। दूसरी ओर, यदि गवर्नर के अधिकार को मान्य किया जाता है, तो भविष्य में इसी प्रकार के नैतिक प्रश्नों को संभालने की प्रक्रिया में बदलाव आ सकता है।
निष्कर्ष
यह मामला केवल एक व्यक्तिगत निलंबन नहीं, बल्कि राज्य के सार्वजनिक संस्थानों में नैतिकता, पारदर्शिता और संवैधानिक अधिकारों के संतुलन को परखने का एक बड़ा परीक्षण है। कोर्ट के अंतिम निर्णय से कर्नाटक के प्रशासनिक ढांचे में संभावित सुधार या पुनःसमीक्षा की दिशा तय होगी।