सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को तीन महीनों के भीतर बुजुर्ग व टर्मिनल बीमार कैदियों की शीघ्र रिहाई के लिए एक समान नीति तैयार करने का निर्देश दिया। यह कदम मानवीय कारणों और जेलों में भीड़भाड़ कम करने के लक्ष्यों को जोड़ता है।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • सभी राज्य तीन महीने में समान रिहाई नीति तैयार करेंगे।
  • UNODC की परिभाषा के आधार पर टर्मिनल बीमारी की स्पष्ट मानक तय होगी।
  • ई-प्रिज़न पोर्टल के माध्यम से पारदर्शी और समय‑बद्ध प्रक्रिया सुनिश्चित होगी।

सुप्रीम कोर्ट ने 16 जुलाई, 2026 को एक दो‑जजों की बेंच (जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता) के माध्यम से राष्ट्रीय कानूनी सेवा प्राधिकरण (NALSA) द्वारा दायर याचिका पर आदेश जारी किया। इस आदेश में सभी राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों को तीन महीनों के भीतर बुजुर्ग व टर्मिनल बीमार कैदियों की शीघ्र रिहाई के लिए एक समान, विस्तृत नीति बनानी अनिवार्य की गई।

पृष्ठभूमि और वर्तमान समस्या

देश के कई कारागारों में भीड़भाड़ एक सतत समस्या बन चुकी है। NALSA ने अपने निरीक्षणों में पाया कि बुजुर्ग और गंभीर रोगियों के लिए कोई राष्ट्रीय स्तर की समान नीति नहीं है, जिसके कारण कई रोगग्रस्त कैदी अनावश्यक रूप से जेल में रह जाते हैं। इस अंतराल को पाटने के लिए कोर्ट ने मानवीय कारणों को प्रमुखता देते हुए एक स्पष्ट ढांचा तैयार करने का आदेश दिया।

नीति के मुख्य तत्व

आदेश में स्पष्ट रूप से कहा गया कि प्रत्येक राज्य को पात्रता मानदंड, प्रक्रियात्मक ढांचा और टर्मिनल बीमारी की परिभाषा को राज्य कानूनी सेवा प्राधिकरण (SLSA) के सहयोग से तैयार करना होगा। टर्मिनल बीमारी की परिभाषा UNODC के “हैंडबुक ऑन प्रिज़नर्स विथ स्पेशल नीड्स” से ली जाएगी, जिसमें यह बताया गया है कि रोग ऐसी स्थिति में है जहाँ रोगी की हालत सुधारने की कोई संभावित चिकित्सा संभावना नहीं रहती।

स्वतंत्र चिकित्सा बोर्ड और निगरानी समिति

राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों को स्वतंत्र चिकित्सा बोर्ड बनाने का निर्देश दिया गया है, जो टर्मिनल बीमारी या अत्यधिक उम्र के मामलों का मूल्यांकन करेंगे। साथ ही, अंडर ट्रायल रिव्यू कमिटियों (UTRC) को भी इस नीति के साथ जोड़कर नियमित रूप से इन मामलों की समीक्षा करनी होगी, जिससे बॉल, पैरोल, रिमिशन या रिहाई जैसे निर्णय शीघ्रता से लिये जा सकें।

डिजिटल समाधान और अनुपालन

न्यायिक आदेश में राष्ट्रीय सूचना केंद्र (NIC) के सहयोग से एक ई‑प्रिज़न पोर्टल विकसित करने का भी उल्लेख है। यह पोर्टल आवेदन प्रक्रिया को स्वचालित अलर्ट, समय‑सीमा की निगरानी और पारदर्शी रिपोर्टिंग के माध्यम से तेज़ करेगा, साथ ही कैदियों की चिकित्सा एवं निजी जानकारी की गोपनीयता भी सुनिश्चित करेगा। प्रत्येक राज्य को छह महीने के भीतर अनुपालन शपथपत्र जमा करना होगा, जिसमें रिहाई के लिए पहचान किए गए कैदियों की संख्या, स्वीकृत मामलों और शेष मामलों की जानकारी होगी। यह शपथपत्र 19 जनवरी, 2027 को सुप्रीम कोर्ट में प्रस्तुत किया जाएगा।

संभावित प्रभाव

नीति का सफल कार्यान्वयन न केवल मानवीय दृष्टिकोण से आवश्यक है, बल्कि जेलों में भीड़भाड़ घटाकर संसाधनों की बेहतर उपयोगिता भी सुनिश्चित करेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली में सुधार की दिशा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित हो सकता है, जिससे भविष्य में समान मानवीय‑आधारित सुधारों की राह खुलेगी।