इलाहाबाद हाई कोर्ट ने यह कहा कि सरोगेसी अधिनियम की आयु सीमा का कड़ाई से पालन महिलाओं के प्रजनन अधिकार का उल्लंघन करेगा। अदालत ने 17‑साल के विवाहित दंपति को सरोगेसी प्रक्रिया जारी रखने की अनुमति दी।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • सरोगेसी (नियमन) अधिनियम, 2021 में महिला की आयु सीमा 23‑50 वर्ष है।
  • इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इस सीमा के सख्त अनुप्रयोग को संवैधानिक अधिकारों के खिलाफ माना।
  • दंपति को अब लखनऊ के मुख्य चिकित्सा अधिकारी से आवेदन करके सरोगेसी प्रक्रिया जारी रखने की अनुमति है।

लखनऊ में 17 साल से विवाहित एक दंपति, जिसने कई बार इन विट्रो फर्टिलाइज़ेशन (IVF) की कोशिश की लेकिन सफल नहीं हो सका, ने अपनी प्रजनन भविष्य को सुरक्षित करने के लिए सरोगेसी की राह अपनाने की इच्छा जताई। सरोगेसी (नियमन) अधिनियम, 2021 के तहत 50 वर्ष से अधिक आयु वाली महिलाओं को सरोगेसी करने से रोकने की धारा के कारण उनका मामला अदालत में पहुँचा।

पृष्ठभूमि और कानूनी ढांचा

2021 में लागू किया गया सरोगेसी अधिनियम, महिला की आयु 23‑50 वर्ष और पुरुष की आयु 26‑55 वर्ष निर्धारित करता है, जिससे ‘इंटेंडिंग कपल’ की परिभाषा स्पष्ट होती है। हालांकि, इस नियम का कड़ाई से पालन करने से उन दम्पतियों के मौलिक अधिकार—जैसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता के तहत अनुच्छेद 21—का उल्लंघन हो सकता है, जैसा न्यायालय ने कहा।

अदालत का निर्णय

जज शेखर बी. सराफ और जज अभ्देश कुमार चौधरी की द्विपक्षीय बेंच ने 7 जुलाई को अपने आदेश में कहा, “सरोगेसी अधिनियम की आयु सीमा का कठोर अनुप्रयोग प्रजनन स्वायत्तता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन करता है।” उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि सुप्रीम कोर्ट ने पहले ऐसे दम्पति को राहत दी थी, जिन्होंने अधिनियम लागू होने से पहले एंब्रियो सुरक्षित किए थे। इस आधार पर अदालत ने लखनऊ के मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) को दम्पति के आवेदन को सुनने और उचित कारण सहित आदेश जारी करने का निर्देश दिया।

दृष्टिकोण और संभावित प्रभाव

यह फैसला केवल एक केस को ही नहीं, बल्कि भारत में सरोगेसी कानून की व्याख्या में एक नई दिशा स्थापित करता है। आयु सीमा को लचीला मानने से भविष्य में अधिक दम्पति, विशेषकर वरिष्ठ महिलाओं, को वैकल्पिक प्रजनन तकनीकों का लाभ मिल सकता है। साथ ही, यह निर्णय स्वास्थ्य विभाग को स्पष्टता प्रदान करता है कि पूर्व‑अधिनियम स्थितियों में एंब्रियो संरक्षण को कैसे मान्यता दी जानी चाहिए।

आगे का रास्ता

दम्पति को अब तीन सप्ताह के भीतर सही फॉर्मेट में अपना आवेदन लखनऊ CMO को जमा करना होगा। यदि CMO उन्हें सुनवाई के अवसर देता है और कारण सहित आदेश जारी करता है, तो सरोगेसी प्रक्रिया कानूनी रूप से आगे बढ़ सकेगी। इस निर्णय से यह स्पष्ट होता है कि भारतीय न्यायपालिका प्रजनन अधिकारों को संवैधानिक सुरक्षा प्रदान करने में सक्रिय भूमिका निभा रही है।