हैदराबाद के सिटिज़न्स स्पेशाल्टी अस्पताल में 41 वर्षीय महिला को 19 सेंटीमीटर के विशाल फाइब्रॉइड और गर्भाशय टॉर्शन की जटिलता से बचाया गया। आपातकालीन हिस्टरेक्टमी और रक्त संक्रमण के बाद रोगी अब स्थिर अवस्था में है। यह केस भारत में फाइब्रॉइड‑संबंधित जटिलताओं की दुर्लभता को उजागर करता है।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • 19 सेमी के विशाल फाइब्रॉइड ने गर्भाशय को टॉर्शन कर दिया, जो अत्यंत दुर्लभ है।
  • आपातकालीन हिस्टरेक्टमी, द्विपक्षीय सैल्पिंगो‑ओफ़ोरेक्टॉमी और एपेंडेक्टॉमी की जटिल प्रक्रिया सफल रही।
  • तीन यूनिट पैक्ड रेड ब्लड सेल्स के बाद रोगी स्थिर स्थिति में डिस्चार्ज हुई।

हैदराबाद स्थित सिटिज़न्स स्पेशाल्टी अस्पताल में 41 वर्षीय महिला रोगी की स्थिति को गंभीरता से लेकर उपचार किया गया, जो भुवनेश्वर से आई थी। वह तीव्र पेट दर्द और गंभीर एनीमिया के साथ अस्पताल पहुंची, जहाँ अल्ट्रासाउंड और सीटी स्कैन ने 19 सेमी के विशाल फाइब्रॉइड और गर्भाशय टॉर्शन की पुष्टि की। गर्भाशय टॉर्शन, यानी गर्भाशय का अपने समर्थन संरचनाओं पर घुमाव, भारतीय चिकित्सा इतिहास में अत्यंत कम देखा गया मामला है।

पृष्ठभूमि और रोग की गंभीरता

गर्भाशय फाइब्रॉइड, या लेयोमीओमा, महिलाओं में सामान्यतः पाई जाने वाली गैर‑कैंसरous ट्यूमर हैं, जो लगभग 20‑30 % महिलाओं को प्रभावित करती हैं। हालांकि अधिकांश फाइब्रॉइड छोटे होते हैं और हल्के लक्षण देते हैं, 10 सेमी से अधिक के फाइब्रॉइड को “विशाल” माना जाता है और यह रक्तस्राव, अनियमित मासिक धर्म, तथा दुर्लभ जटिलताओं जैसे टॉर्शन की ओर ले जा सकता है। इस मामले में, फाइब्रॉइड ने गर्भाशय को पूरी तरह मोड़ दिया, जिससे रक्त आपूर्ति बाधित हुई और जीवन‑संकट उत्पन्न हुआ।

शल्य चिकित्सा प्रक्रिया

सिटिज़न्स अस्पताल की अनुभवी टीम ने तत्काल आपातकालीन हिस्टरेक्टमी की योजना बनाई। प्रमुख शल्य चिकित्सक ज्योति कंकनाला ने द्विपक्षीय सैल्पिंगो‑ओफ़ोरेक्टॉमी, एपेंडेक्टॉमी के साथ जटिल शल्य प्रक्रिया को सफलतापूर्वक अंजाम दिया। प्रक्रिया के दौरान आंतरिक रक्तस्राव और विकृत शारीरिक संरचना ने कार्य को कठिन बना दिया, परंतु टीम ने कुशलता से रक्तस्राव को नियंत्रित किया। रोगी को तीन यूनिट पैक्ड रेड ब्लड सेल्स का संक्रमण किया गया, जिससे एनीमिया दूर हुआ और शारीरिक स्थिति स्थिर हुई।

उपचार के बाद की स्थिति और भविष्य की दिशा

सर्जरी के बाद रोगी को पर्याप्त देखभाल मिली और वह स्थिर स्थिति में घर वापसी कर सकी। यह केस न केवल फाइब्रॉइड‑संबंधित जटिलताओं की संभावित गंभीरता को उजागर करता है, बल्कि विशेषज्ञता वाले मल्टी‑डिसिप्लिनरी केंद्रों में समय पर उपचार के महत्व को भी रेखांकित करता है। भविष्य में, बड़े फाइब्रॉइड की प्रारंभिक पहचान और नियमित निगरानी से ऐसी जीवन‑संकट स्थितियों को टाला जा सकता है।