भारत में मानसून का निरंतर विराम बारिश के घाटे को 24% तक धकेल रहा है, जिससे फसलों और जल संसाधनों पर गहरा असर पड़ रहा है। अगले दस दिनों में संभावित पुनरुद्धार भी सीमित रूप से ही दिख रहा है。
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- जुलाई 16 तक कुल वर्षा सामान्य से 24% कम
- अगले 10 दिनों में बारिश में सुधार की संभावना, लेकिन 30% घाटा तक गिरने का जोखिम
- फसल बोनी, जलभंडार और बाढ़‑भूस्खलन जोखिम पर प्रभाव
भारत का दक्षिण‑पश्चिमी मानसून अभी एक विस्तारित ‘ब्रेक’ चरण में प्रवेश कर चुका है, जिससे 4 जून से 16 जुलाई तक के कुल मौसमी वर्षा में 24% की कमी दर्ज की गई है। यह आंकड़ा भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के नवीनतम डेटा पर आधारित है और पिछले हफ्ते‑हफ्ते विस्तारित कमी को दर्शाता है।
क्षेत्रीय स्थिति
रजस्थान, गुजरात, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और असम जैसे बड़े हिस्सों में वर्षा का अभाव स्पष्ट है, जबकि मध्य भारत के कुछ हिस्से, महाराष्ट्र, ओडिशा, पश्चिम बंगाल और उत्तर‑पूर्वी राज्य अभी भी सामान्य या उससे अधिक वर्षा प्राप्त कर रहे हैं।
वायुमंडलीय कारण
विज्ञानियों ने बताया कि मॉनसून ट्रॉफ का हिलालय हिमालयी foothills के पास शिफ्ट हो गया है, जिससे उत्तर एवं मध्य भारत में वर्षा घट गई। बंगाल की खाड़ी में कम दबाव प्रणाली की अनुपस्थिति ने नमी के परिवहन को भी बाधित किया, जिससे कई क्षेत्रों में उच्च तापमान और आर्द्रता बनी रही।
आगामी पुनरुद्धार की संभावना
मॉडलिंग संकेत देती है कि बंगाल की खाड़ी में एक नई लो‑प्रेशर एरिया विकसित होने से और मॉनसून अक्ष के दक्षिण की ओर शिफ्ट होने से आने वाले सप्ताहांत में व्यापक वर्षा का पुनरुद्धार हो सकता है। पहला चरण उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में शनिवार को शुरू होगा, जिसके बाद रविवार‑सोमवार तक पंजाब, हरियाणा, दिल्ली‑एनसीआर और पूर्वी राजस्थान में भारी वर्षा की संभावना है।
कृषि और जल सुरक्षा पर असर
जैसे ही फसल बोनी धीमी हुई, मिट्टी की नमी घटी और कई कृषि-प्रधान राज्यों में वर्षा का अंतर बढ़ा। यदि लगातार बरसात हो तो जलाशयों में जल प्रवाह सुधरेगा, भूजल स्तर बढ़ेगा और जल उपलब्धता की चिंताएँ कम होंगी। हालांकि, इस तीव्र बारिश से उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश जैसे पहाड़ी क्षेत्रों में बाढ़, भूस्खलन और अचानक वर्षा‑भंवर (क्लाउडबर्स्ट) का जोखिम भी बढ़ सकता है।