भारत में 1 जून से 16 जुलाई तक बारिश में 24% की कमी दर्ज हुई, जो 2002 के सूखे के 19% घाटे से अधिक है। मौसम विभाग ने एल नीनो और न्यूट्रल भारतीय महासागर डिपोल को मुख्य कारण बता कर सीमित क्षेत्रों में ही भारी बारिश की भविष्यवाणी की है।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • 2026 के मानसून में 24% का कुल घाटा दर्ज
  • यह 2002 के गंभीर सूखे के 19% घाटे से अधिक है
  • एल नीनो, न्यूट्रल IOD और MJO की अनुकूल न रहने वाली स्थिति प्रमुख कारण

भारत में 1 जून से 16 जुलाई तक कुल वर्षा 224.8 mm रही, जबकि दीर्घकालिक औसत (LPA) 295.8 mm है। इसका मतलब 24 % की कमी, जो मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के अनुसार ऐतिहासिक रूप से बहुत गंभीर मानदंड बन गया है।

क्षेत्रीय अंतर

घाटा समान रूप से नहीं बँटा। पूर्व और उत्तर‑पूर्व भारत में 36 % तक कमी, दक्षिणी प्रायद्वीप में 26 %, उत्तर‑पश्चिम में 19 % और मध्य भारत में 13 % कमी दर्ज की गई। 9‑15 जुलाई के एक हफ़्ते में तो राष्ट्रीय औसत से 51 % नीचे बारिश हुई, जबकि जून 2026 को 1901 के बाद से पाँचवाँ सबसे सूखा महीना रहा।

क्यों कमजोर?

मुख्य कारणों में एल नीनो का प्रभाव प्रमुख है, जो प्रशांत महासागर के सतह के पानी को असामान्य रूप से गर्म कर देता है और वैश्विक पवन पैटर्न को बदल देता है, जिससे भारत की मॉनसून‑भरी हवाएँ कमजोर पड़ती हैं। 2002 के सूखे में भी यही कारक था। इसके अलावा, भारतीय महासागर डिपोल (IOD) का वर्तमान न्यूट्रल चरण मॉनसून को समर्थन नहीं दे रहा, जबकि मैडेन‑जुलियन ऑसिलेशन (MJO) भी अनुकूल स्थिति में नहीं है।

आगे की संभावना

IMD की 16 जुलाई की रिपोर्ट के अनुसार, अगले सात दिनों में पूर्व और उत्तर‑पूर्व भारत, उत्तर प्रदेश के पूर्व भाग और पश्चिमी हिमालयी क्षेत्रों में बिखरी हुई भारी‑भारी बारिश की संभावना है। हालांकि, मध्य‑पश्चिम और दक्षिणी प्रायद्वीप में बारिश काफी सीमित रहेगी, और जुलाई के समग्र औसत में LPA का 94 % से कम रहना अनुमानित है।

सूखे का खतरा

पर्यावरणीय सूखा तभी घोषित किया जाता है जब मौसमी वर्षा LPA के 75 % से नीचे गिरती है। 24 % की कमी अभी सूखे की सीमा नहीं बनाती, परन्तु खारिफ़ फसल, जलभंडार और जलस्रोतों पर दबाव बढ़ाती है। यदि शेष मौसम में भी कमी बनी रही, तो 2026 का मानसून 2002 के समान गंभीरता तक पहुँच सकता है।

विश्लेषक की राय

जलवायु विशेषज्ञों का मानना है कि एल नीनो की तीव्रता और IOD के न्यूट्रल चरण के कारण 2026 का मानसून दो दशकों में सबसे कमजोर शुरुआती संकेतों में से एक है। लंबी अवधि में जलभंडार प्रबंधन और फसल चयन में अनुकूलन आवश्यक होगा।