सुप्रीम कोर्ट ने सीबीएसई की कक्षा‑6 के लिए अनिवार्य तीन‑भाषा योजना को स्थगित करने की याचिका को अस्वीकार करते हुए इंग्लिश को स्वदेशी भाषा मानने की परिभाषा पर फिर से सवाल उठाए। यह निर्णय राष्ट्रीय भाषा नीति और बहुभाषी शिक्षा के भविष्य को प्रभावित करेगा।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • सुप्रीम कोर्ट ने अंग्रेजी को स्वदेशी भाषा मानने की परिभाषा पर पुनर्विचार का आह्वान किया।
  • सीबीएसई की तीन‑भाषा योजना को रोकने की याचिका को विस्तृत सुनवाई के बिना खारिज किया गया।
  • केन्द्र और सीबीएसई अगले दस दिनों में अपनी प्रतिक्रिया प्रस्तुत करेंगे।

नई दिल्ली: भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने मंगलवार को एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठाया – क्या अंग्रेजी को स्वदेशी भाषा माना जा सकता है? यह सवाल तब आया जब कोर्ट ने सीबीएसई (सेंट्रल बोर्ड ऑफ सेकंडरी एजुकेशन) की तीन‑भाषा योजना को कक्षा 6 से अनिवार्य करने के प्रस्ताव को स्थगित करने की याचिका को अस्वीकार कर दिया।

पृष्ठभूमि एवं कानूनी परिप्रेक्ष्य

सीबीएसई ने इस शैक्षणिक सत्र से शुरू होकर कक्षा 6 के विद्यार्थियों को हिन्दी, एक क्षेत्रीय भाषा और अंग्रेजी के साथ तीन‑भाषा पाठ्यक्रम अपनाने का प्रस्ताव रखा। यह कदम राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) के बहुभाषी लक्ष्य और संविधान के हिन्दी को राजभाषा बनाते हुए अन्य क्षेत्रीय भाषाओं को प्रोत्साहित करने के सिद्धांतों के अनुरूप बताया गया। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस योजना को तत्काल रोकने की याचिका को विस्तृत सुनवाई के बिना खारिज कर दिया, परन्तु कहा कि “स्वदेशी भाषा की परिभाषा पर पुनर्विचार आवश्यक हो सकता है”।

आरोप एवं चुनौतियां

याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि जबकि 22 भाषाओं में से छात्रों को विकल्प दिया गया है, वास्तविकता में स्कूलों के पास पर्याप्त शिक्षक, बुनियादी ढांचा और पाठ्य सामग्री नहीं है। उन्होंने यह भी उजागर किया कि एनसीईआरटी (राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद) की वेबसाइट पर केवल तीन भाषाओं की पुस्तकें उपलब्ध थीं, जबकि शेष 19 भाषाओं के सामग्री अभी तक अपलोड नहीं हुई थीं। यह कमी शैक्षणिक समानता और भाषा अधिकारों को प्रभावित करती है।

केन्द्र और सीबीएसई का उत्तर

अतिरिक्त अधिवक्ता जनरल ऐश्वर्या भाटी ने बताया कि केंद्र और सीबीएसई अगले दस दिनों में अपनी लिखित प्रतिक्रियाएँ प्रस्तुत करेंगे। केंद्र ने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति का लक्ष्य भारतीय मूल्यों पर आधारित शिक्षा प्रणाली बनाना है, जो बहुभाषीता और राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ करता है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि तीन‑भाषा सूत्र में लचीलापन रहेगा और किसी भी राज्य पर किसी भाषा को थोपना नहीं होगा।

भविष्य की संभावनाएँ

इस विकास के साथ, यह स्पष्ट है कि भाषा नीति पर चर्चा अब केवल शैक्षिक स्तर तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनैतिक आयामों को भी समेटेगी। यदि अंग्रेजी को “स्वदेशी” मानने की परिभाषा बदलती है, तो यह भाषा शिक्षा, रोजगार और अंतरराष्ट्रीय संवाद पर व्यापक प्रभाव डाल सकती है।