कन्नड़ फिल्म और संगीत जगत ने शह़ीद 88 वर्षीय एस. जानकी के निधन पर गहरा शोक व्यक्त किया। उनके बहु‑शैली गायन, युवा प्रेम गीतों से लेकर बच्चों के गानों तक, कन्नड़ संस्कृति का अभिन्न हिस्सा रहे।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- एस. जानकी का निधन कन्नड़ सिनेमा में एक युग समाप्त करता है।
- उनकी बहु‑शैली गायन कला ने कई पीढ़ियों को प्रेरित किया।
- देश‑व्यापी संगीतकारों ने उनका सम्मान किया, जिससे उनका वारसा और भी सुदृढ़ हुआ।
कन्नड़ फिल्म उद्योग ने शनिवार (11 जुलाई) को म्यूर में 88 वर्ष की आयु में सुप्रसिद्ध प्लेबैक सिंगर एस. जानकी के निधन पर शोक व्यक्त किया। उनका निधन न केवल कन्नड़ संगीत प्रेमियों को, बल्कि सम्पूर्ण दक्षिण भारतीय सिनेमा को गहरा धक्का पहुंचाता है।
स्मरणीय गीत और उनका सांस्कृतिक प्रभाव
‘नागुवा नयन’ (पल्लवी अनु पल्लवी, 1983) जैसे क्लासिक गीत, जो पुरानी बेंगलुरु की मोहकता को दर्शाते हैं, आज भी श्रोताओं के दिलों में गूँजते हैं। एस. जानकी की सुष्मा आवाज़ और एस. पी. बालासुब्रह्मण्यम के साथ उनका रासायनिक संगम, उस युग के संगीत को शाश्वत बना देता है।
बहु‑शैली में महारत
जब 1987 की ‘प्रेमलोक’ ने युवा‑प्रेम गीतों का नया दौर शुरू किया, तो जानकी ने ‘इडु नन्ना निन्ना प्रेम गीते चिन्ना’ में अपनी ऊर्जा और नवयुग की ताजगी को प्रदर्शित किया। संगीतकार गुरुकीरन ने उन्हें ‘दक्षिण भारतीय संगीत की रानी’ कहा, जबकि इलाईराजा ने उनके बिना कोई गीत नहीं गाया। यह तथ्य दर्शाता है कि वह केवल एक आवाज़ नहीं, बल्कि एक संगीतात्मक युग की प्रतीक थीं।
भाषा और अभिव्यक्ति में अद्वितीय कौशल
कन्नड़ नहीं बोलने वाले गीतकार वी. नेग्रदा प्रसाद ने कहा, “जानकी ने कन्नड़ सीखकर उस भाषा में भावनाओं को उतनी ही सहजता से व्यक्त किया, जितना वह अपनी मातृभाषा में करती थीं।” उनके बालगीतों, जैसे ‘ए ए ई ई कन्नड़ अक्षरमाला’, ने कई छोटे‑छोटे दिलों को संगीत की दुनिया से परिचित कराया।
इतिहास में उनका स्थान
फिल्म इतिहासकार के. पुट्टस्वामी के अनुसार, ‘गालिगोपुरा निनाशथेरे’ (नंदा डीपा, 1962) और ‘यावा जन्मदा मैत्री’ (गौरी) जैसी सोलो क्लासिक्स ने कन्नड़ संगीत को नई ऊँचाइयों पर पहुँचाया। उन्होंने पुत्तनाका नालायक के ‘गैजेनावु एल्लो’ से लेकर राजन-नगेन्द्र की ‘एल्लु होगल्ला’ तक हर प्रमुख संगीतकार के साथ काम किया।
उनकी आवाज़ में वह गहराई और स्पष्टता थी, जिससे वह बिना किसी ‘पिच करेक्शन’ के भी हर स्वर को सटीकता से पकड़ लेती थीं। यह उनकी अद्भुत तकनीकी क्षमता का प्रमाण है, जिसे आज के डिजिटल युग में भी सराहा जाता है।
एस. जानकी के निधन से कन्नड़ सिनेमा की एक सुनहरी धारा समाप्त हुई, पर उनका संगीत भविष्य की पीढ़ियों के लिए एक स्थायी धरोहर बना रहेगा।