ज़ी5 पर 3 जुलाई को रिलीज़ हुई फिल्म ‘Satluj’ को सिर्फ 48 घंटे में भारत में प्रतिबंधित कर दिया गया। निर्देशक हनी ट्रीहन ने इस कदम को मानवाधिकार कार्यकर्ता जस्वंत सिंह खलरा की फिर से ‘अभिज्ञात’ होने की तुलना की।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- Satluj 3 जुलाई को Zee5 पर रिलीज़ हुई, लेकिन 48 घंटों में भारत में प्रतिबंधित हुई।
- निर्देशक हनी ट्रीहन ने फिल्म को जस्वंत सिंह खलरा की दोबारा ‘अभिज्ञात’ होने से जोड़ा।
- सरकारी दबाव, सेंसरशिप बोर्ड की मांग और प्लेटफ़ॉर्म की रणनीति ने रिलीज़ को मौन रखा।
फ़िल्म Satluj, जिसका मुख्य किरदार दिलजीत दोसांझ ने निभाया है, मानवाधिकार कार्यकर्ता जस्वंत सिंह खलरा के जीवन पर आधारित है। यह कहानी 1990 के दशक में पंजाब में हुई अत्याचारों और खलरा की 1995 में पुलिस द्वारा अपहरण की सच्ची घटनाओं को उजागर करती है। फिल्म को 3 जुलाई को Zee5 पर एक ‘हश‑हश रिलीज़’ के रूप में पेश किया गया, जिसमें ट्रेलर और प्रमोशन देर से आए, क्योंकि निर्माताओं को सरकार द्वारा लगातार दबाव का सामना करना पड़ा।
प्लेटफ़ॉर्म और शीर्षक में बदलाव
निर्माताओं ने बताया कि रिलीज़ से पहले उन्हें Zee5 ने ‘Punjab ’95’ के तहत फिल्म को लॉन्च करने का प्रस्ताव दिया। ट्रीहन ने स्पष्ट किया कि शीर्षक ‘Satluj’ पहले से ही रजिस्टर था और कोई भी कट नहीं किया जाना चाहिए था। सेंटर बोर्ड ऑफ़ फ़िल्म सर्टिफ़िकेशन (CBFC) ने मूल शीर्षक ‘Ghallughara’ (जिनका अर्थ ‘नरसंहार’ है) को बदलने की माँग की; इसके बाद ‘Punjab ’95’ और ‘Satluj’ जैसे विकल्प पेश किए गए, लेकिन ‘Satluj’ हमेशा से ही मंज़ूर था।
सरकारी प्रतिक्रिया और प्रतिबंध
फ़िल्म को भारत में 48 घंटे के भीतर ही ब्लॉक कर दिया गया, और Zee5 ने इसे विश्वभर से हटा दिया। ट्रीहन ने इस कदम को “हृदय‑विध्वंसक” कहा और पूछा कि क्या भारत वास्तव में लोकतांत्रिक है। उन्होंने याद दिलाया कि 31 साल पहले जस्वंत सिंह खलरा को पुलिस ने अपहृत कर मार दिया था, और अब वही कहानी फिर से दोहराई जा रही है। उन्होंने केंद्र सरकार से अपील की कि खलरा की कहानी को दुनिया को बताने की अनुमति दें, न कि उसे फिर से ‘अभिज्ञात’ किया जाए।
सरकारी पैनल का तर्क और वास्तविक असर
सरकार ने कहा कि फिल्म को “शत्रु तत्वों”, पाकिस्तान या अलगाववादी समूहों द्वारा दुरुपयोग किया जा सकता है, जिससे पंजाब में कानून‑व्यवस्था बिगड़ सकती है। ट्रीहन ने इस दावे को खारिज करते हुए कहा कि फिल्म ने वास्तव में पंजाब के विभिन्न समुदायों—हिंदुओं और सिखों—को एक साथ लाया है, और यह सामाजिक चोटों को भरने वाला “बाम” है। उन्होंने कहा कि प्रतिबंध के बाद फिल्म एक आंदोलन बन गई है, जहाँ दर्शक शांति और सद्भाव के साथ फिल्म देखते हैं और लंगर भी परोसा जाता है।
भविष्य की दिशा
बिलकुल स्पष्ट है कि ‘Satluj’ का मामला भारतीय सिनेमा में सेंसरशिप और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच एक नई लड़ाई का प्रतीक बन गया है। यदि सरकार फिल्म को “प्रोपेगैंडा” कहकर प्रतिबंधित करती है, तो वह खुद ही अपनी नीति के दोहरे मानकों को उजागर कर रही है। इस प्रकार, ‘Satluj’ न केवल एक कहानी है, बल्कि पंजाब के इतिहास, मानवाधिकार और स्वतंत्र अभिव्यक्ति की लड़ाई का भी प्रतीक है।