‘I, Nobody’ एक मनोवैज्ञानिक थ्रिलर है जिसमें सरकारी कर्मचारी राजेवन को बैंक डकैती में फँसाया जाता है। फिल्म का आरम्भ रोचक और सटीक है, पर अंत में कहानी को सुदृढ़ता की कमी महसूस होती है।
निस्सम बैशर द्वारा निर्देशित ‘I, Nobody’ ने इस वर्ष के मलयालम सिनेमा में एक नया अध्याय लिखा है। प्रिथ्वीराज सुकुमारन के प्रमुख किरदार राजेवन की भूमिका में एक साधारण सरकारी कर्मचारी को दिखाया गया है, जो अनजाने में एक बैंक डकैती में उलझ जाता है। यह घटना न केवल उसकी रोज़मर्रा की ज़िन्दगी को उलट देती है, बल्कि उसे एक ‘मैन-अगेनस्ट-दी-सीस्टम’ कथा में खींच लेती है।
कथानक और पात्रों की गहराई
फिल्म के पहले आधे घंटे में कथानक को तंग और सुसंगठित रखा गया है। राजेवन की मानसिक स्थिति, उसकी पत्नी मीरा (परवती) और दो बच्चों के साथ जीवन की सरलता, और अचानक आने वाली आपात स्थिति के बीच का विरोधाभास दर्शकों को आकर्षित करता है। पात्रों को इस प्रकार चित्रित किया गया है कि वे अपने ही ‘रिडेम्प्शन’ के लिए बड़े जोखिम उठाने को तैयार हैं। यह पहलू मलयालम सिनेमा की पारंपरिक कथानक से अलग, एक नया दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है।
तकनीकी पहलू और दृश्य शैली
तकनीकी रूप से, फिल्म की फ्रेमिंग और एडिटिंग को कुछ बेहतरीन मलयालम फ़िल्मों के बराबर बताया गया है। विशेष रूप से फ्लैट इलेक्ट्रीकल लिफ्ट के अंदर का एक्शन सीक्वेंस नवीनता और सटीकता से भरा हुआ है। साउंड डिज़ाइन और सिनेमा ग्राफ़ी ने कहानी के तनाव को बढ़ाया है। परंतु, फिल्म के मध्यांतर के बाद का भाग थोड़ा असंगत महसूस होता है, जैसे कि ‘ए बुधवार’ के बाद के दृश्य।
अंतिम एक्ट की कमज़ोरियाँ
फिल्म का अंतिम भाग, जहाँ राजेवन अपने ‘रिडेम्प्शन’ के पथ पर आगे बढ़ता है, कुछ हद तक अनियोजित और बनावटी प्रतीत होता है। यह भाग दर्शकों को यह सवाल करने पर मजबूर करता है कि फ़िल्म वास्तव में क्या संदेश देना चाहती है। एक आशाजनक शुरुआत के बावजूद, कहानी का समापन कुछ हद तक कमज़ोर हो जाता है।
समीक्षक का निष्कर्ष
‘I, Nobody’ एक ऐसी फ़िल्म है जो जटिल पात्रों और मनोवैज्ञानिक गहराई को प्रस्तुत करती है। हालांकि, इसकी कहानी के समापन में खोया हुआ दृष्टिकोण इसे थोड़ा कमजोर बनाता है। यह मलयालम सिनेमा की क्षमताओं को दर्शाता है, परंतु एक मजबूत निष्कर्ष की आवश्यकता को भी उजागर करता है।