ह्यूमा क़ुरैशी ने बताया कि भारतीय दर्शक नपोटिज़्म से नफरत नहीं करते, बल्कि उन स्टार बच्चों से नाराज़ हैं जो अपने विशेषाधिकार को बिना परिश्रम के मानते हैं। सफलता के लिए प्रतिभा ज़रूरी है, पर अवसरों का सही उपयोग ही फर्क डालता है।

भारत के सिनेमा उद्योग में नपोटिज़्म का सवाल हमेशा से एक गर्म विषय रहा है। 2018 में शाहरुख़ खान के बेटे आमिर खान के पेरिस में जन्म लेने के बाद से लेकर 2024 में शाहरुख़ खान के बेटे राजीव खान की पहली फिल्म के रिलीज़ तक, दर्शकों ने कई बार यह सवाल उठाया है कि क्या परिवारिक संबंधों को प्राथमिकता दी जा रही है।

ह्यूमा क़ुरैशी का दृष्टिकोण

ह्यूमा क़ुरैशी, जो अपनी नई थ्रिलर Baby Do Die Do में एक हत्यारे की भूमिका निभा रही हैं, ने हाल ही में एक पॉडकास्ट में स्पष्ट किया कि “नपोटिज़्म” का मुद्दा नहीं बल्कि “अधिकारिता” है। उन्होंने कहा, “मेरा मानना है कि लोग किसी को जन्म के आधार पर नफरत नहीं करते, पर जब वह अपनी सुविधा और अवसरों का सही ढंग से उपयोग नहीं करता, तब ही दर्शक नाराज़ होते हैं।”

प्रतिभा और अवसर का संतुलन

ह्यूमा ने ज़ोर देकर कहा कि “प्रतिभा ज़रूरी है” और “बिना प्रतिभा के कोई भी दीर्घकालिक सफलता नहीं पा सकता।” उन्होंने यह भी जोड़ा कि “परिवारिक संबंधों से दरवाज़े खुलते हैं, पर उन दरवाज़ों को खोलने के बाद काम का बोझ और मेहनत पर निर्भर करता है।” इस कथन से यह स्पष्ट होता है कि नपोटिज़्म की आलोचना का मूल कारण केवल अवसरों का होना नहीं, बल्कि उन अवसरों का सही उपयोग न करना है।

उद्योग में बदलती सोच

हाल के वर्षों में कई युवा कलाकारों ने अपने अनुभव साझा किए हैं कि “बिना किसी कनेक्शन के उद्योग में प्रवेश करना कितना कठिन है।” इसके विपरीत, “स्टार बच्चों” को अक्सर “सुविधाजनक” और “सुविधा से भरा” कहा जाता है। ह्यूमा ने इस बात पर प्रकाश डाला कि “दर्शकों की प्रतिक्रिया इस बात पर निर्भर करती है कि कलाकार अपनी सुविधा को कैसे संभालता है।”

भविष्य की राह

ह्यूमा की आगामी फिल्म Toxic: A Fairy Tale for Grown-Ups के साथ, वह न सिर्फ अपनी अभिनय क्षमताओं को दिखाने का मौका पा रही हैं, बल्कि यह भी साबित करने का कि “अधिकारिता” को कैसे परखा जा सकता है। उनकी बातें नपोटिज़्म पर एक नया दृष्टिकोण प्रस्तुत करती हैं, जिसमें मुख्य ध्यान ‘कैसे उपयोग किया जाता है’ पर है, न कि ‘किसने दिया’ पर।