जुलाई 1976 में, आंध्र प्रदेश ने अमेरिकी रिटेल दिग्गज 'सियर्स' को सीधे 1 करोड़ रुपये के हथकरघा शर्ट निर्यात करने के लिए एक ऐतिहासिक संयुक्त उद्यम शुरू किया, जिससे बिचौलियों का अंत हुआ।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- जुलाई 1976 में आंध्र प्रदेश ने अमेरिका को 1 करोड़ रुपये के हथकरघा उत्पाद निर्यात करने का ऐतिहासिक समझौता किया।
- अमेरिकी तेलुगु प्रवासियों के सहयोग से 'इंडिया फैशन्स इनकॉर्पोरेटेड' के साथ एक संयुक्त क्षेत्र की कंपनी का गठन किया गया।
- इन हथकरघा शर्टों को अमेरिकी रिटेल दिग्गज 'सियर्स' को सीधे बेचा गया, जिससे बिचौलियों की भूमिका समाप्त हो गई।
जुलाई 1976 में, आंध्र प्रदेश राज्य कपड़ा विकास निगम (APSTDC) और अमेरिकी प्रवासी भारतीयों द्वारा संचालित 'इंडिया फैशन्स इनकॉर्पोरेटेड लिमिटेड' ने मिलकर वैश्विक व्यापार में एक क्रांतिकारी कदम उठाया था। इस साझेदारी का मुख्य उद्देश्य भारतीय हथकरघा उत्पादों को सीधे अमेरिकी बाजारों में पहुंचाना था, जो उस समय के भारतीय कपड़ा उद्योग के लिए एक बहुत बड़ी उपलब्धि थी।
वैश्विक रिटेल दिग्गज 'सियर्स' के साथ ऐतिहासिक साझेदारी
तत्कालीन हथकरघा मंत्री श्री के.वी. केसावुलु ने घोषणा की थी कि इस नई कंपनी ने अमेरिका की प्रसिद्ध डिपार्टमेंटल स्टोर श्रृंखला सियर्स (Sears) के साथ एक बड़ा समझौता किया है। इसके तहत भारतीय कारीगरों द्वारा तैयार की गई हथकरघा शर्ट और अन्य कपड़ा सामग्री अमेरिकी उपभोक्ताओं के लिए सीधे उपलब्ध कराई जानी थी। इस सौदे की कुल कीमत उस समय लगभग एक करोड़ रुपये आंकी गई थी, जो 1970 के दशक के लिहाज से एक अत्यंत महत्वपूर्ण राशि थी।
प्रवासी भारतीयों का अभूतपूर्व योगदान
इस नए उद्यम की आधी पूंजी अमेरिका में रहने वाले तेलुगु भाषी भारतीय नागरिकों द्वारा निवेश की गई थी। इंडिया फैशन्स के प्रतिनिधियों, श्री शास्त्री और श्री मोहन ने उद्योग विभाग के सचिव श्री एस.आर. राममूर्ति और मंत्री के साथ बैठक कर इस समझौते को अंतिम रूप दिया था। यह शुरुआती दौर में भारतीय प्रवासियों (Diaspora) द्वारा अपनी मातृभूमि के आर्थिक विकास में योगदान देने का एक उत्कृष्ट उदाहरण था।
बिचौलियों का खात्मा और बुनकरों का कल्याण
इस रणनीतिक कदम का सबसे बड़ा लाभ यह था कि इसने पारंपरिक हथकरघा व्यापार से बिचौलियों (middlemen) को पूरी तरह से हटा दिया। सीधे अमेरिकी स्टोर से सौदा होने के कारण बुनकरों को उनके श्रम का उचित मूल्य मिला और राज्य के सहकारी ढांचे को मजबूती मिली। इस कदम ने साबित किया कि सरकारी नीतियां यदि सही दिशा में हों, तो वे सीधे जमीनी स्तर के कारीगरों के जीवन में बड़ा बदलाव ला सकती हैं।
भारतीय वस्त्र उद्योग के लिए मील का पत्थर
आज के परिप्रेक्ष्य में देखें तो 1976 का यह प्रयास भारत के आधुनिक कपड़ा निर्यात उद्योग की नींव था। इसने वैश्विक बाजार को यह संदेश दिया कि भारत की पारंपरिक कला और ग्रामीण कारीगरी पश्चिमी देशों के अत्यधिक प्रतिस्पर्धी उपभोक्ता बाजारों में भी अपनी धाक जमा सकती है। यही कारण है कि आज भी भारतीय हथकरघा उत्पादों की मांग दुनिया भर में बनी हुई है।