राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) की अध्यक्ष विजया राहटकर ने कहा है कि अदालतों द्वारा यौन अपराधों की व्याख्या केवल शारीरिक कृत्य तक सीमित नहीं होनी चाहिए। उन्होंने पीड़िता की गरिमा, सहमति और मानसिक आघात को समान महत्व देने की वकालत की है।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) की अध्यक्ष विजया राहटकर ने यौन अपराधों की व्याख्या में पीड़िता की गरिमा और सहमति को प्राथमिकता देने की मांग की।
  • यह बयान पटना उच्च न्यायालय के एक विवादास्पद फैसले के बाद आया है, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने भी आड़े हाथों लिया है।
  • मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने न्यायिक निर्णयों में गहन शोध की कमी पर गंभीर चिंता व्यक्त की है।
  • एनसीडब्ल्यू प्रमुख ने चेतावनी दी कि यदि न्याय प्रणाली तकनीकी व्याख्याओं में उलझी रही, तो न्याय व्यवस्था पर महिलाओं का भरोसा उठ जाएगा।

राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) की नवनियुक्त अध्यक्ष विजया राहटकर ने भारतीय न्याय प्रणाली में महिलाओं के अधिकारों और यौन अपराधों की व्याख्या को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील मुद्दा उठाया है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि अदालतों द्वारा यौन अपराधों की व्याख्या करते समय केवल शारीरिक कृत्य (physical act) पर ही ध्यान केंद्रित नहीं किया जाना चाहिए। इसके बजाय, पीड़िता की गरिमा, उसकी सहमति, घटना के समय उसके द्वारा महसूस किए गए भय और उसके मानसिक आघात (psychological trauma) को भी उतना ही महत्व दिया जाना चाहिए।

विवादास्पद न्यायिक व्याख्या और सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप

श्रीमती राहटकर की यह टिप्पणी पटना उच्च न्यायालय के एक हालिया फैसले की पृष्ठभूमि में आई है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में कहा था कि महिला का सलवार उतारने का प्रयास करना और उसके वक्षस्थल को छूना 'बलात्कार के प्रयास' की श्रेणी में नहीं आता है। इस फैसले पर देश के सर्वोच्च न्यायालय ने भी कड़ी नाराजगी जताई है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ ने इस फैसले की आलोचना करते हुए कहा कि ऐसे संवेदनशील मामलों में निर्णय देने से पहले गहन शोध और संवेदनशीलता की भारी कमी दिखाई देती है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि वह इस मामले में एक विस्तृत और मार्गदर्शक आदेश जारी करेगा।

न्याय की तकनीकी व्याख्या पर उठाए सवाल

एनसीडब्ल्यू प्रमुख ने जोर देकर कहा कि न्याय का उद्देश्य केवल कानून की यांत्रिक या तकनीकी व्याख्या तक सीमित नहीं हो सकता। उन्होंने कहा, "यदि न्यायिक प्रक्रिया पीड़िता के वास्तविक अनुभवों और कानून की मूल भावना से अलग हो जाती है, तो न्याय वितरण प्रणाली में जनता का विश्वास प्रभावित होना स्वाभाविक है।" उन्होंने इस बात पर भी चिंता जताई कि यदि किसी पीड़िता को 18 साल लंबी कानूनी लड़ाई के बाद भी पूर्ण न्याय का अहसास नहीं होता है, और गंभीर यौन अपराधों के दोषियों को सख्त सजा नहीं मिलती, तो यह महिलाओं के आत्मविश्वास को गंभीर चोट पहुंचाता है।

उत्तरजीवी-केंद्रित दृष्टिकोण की आवश्यकता

विजया राहटकर ने महिलाओं की शारीरिक स्वायत्तता, गरिमा और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा को न्याय प्रणाली की "सर्वोच्च प्राथमिकता" बताया। उन्होंने इस दिशा में भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत द्वारा अपनाए गए स्पष्ट, संवेदनशील और उत्तरजीवी-केंद्रित (survivor-centric) दृष्टिकोण का स्वागत किया। उन्होंने उम्मीद जताई कि देश की न्यायपालिका भविष्य में अधिक संवेदनशील और लैंगिक-न्यायसंगत दृष्टिकोण की ओर बढ़ेगी, जहां महिलाओं के अधिकारों को तकनीकी खामियों की भेंट नहीं चढ़ाया जाएगा।