केरल के एक उपभोक्ता आयोग ने मैरिज ब्यूरो द्वारा सेवा में कमी पाए जाने पर एक व्यक्ति को मुआवजा देने का आदेश दिया है। 2016 से इंतजार कर रहे प्रोफेसर को अब न्याय मिला है।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- केरल के उपभोक्ता आयोग ने मैरिज ब्यूरो को पंजीकरण शुल्क वापस करने और मुआवजा देने का आदेश दिया।
- एक नर्सिंग कॉलेज प्रोफेसर ने 2016 में पंजीकरण कराया था, लेकिन 9 साल तक कोई प्रस्ताव नहीं मिला।
- मैरिज ब्यूरो ने सेवा में भारी कमी पाई गई, जिसके कारण पीड़ित को मानसिक पीड़ा हुई।
- आयोग ने ₹3,000 रिफंड, ₹3,000 मुआवजा और ₹2,000 कानूनी खर्च देने का निर्देश दिया।
केरल में एक ऐतिहासिक निर्णय लेते हुए, उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (Consumer Disputes Redressal Commission) ने एक मैरिज ब्यूरो को अपने ग्राहक को मुआवजा देने का आदेश दिया है। यह मामला एक नर्सिंग कॉलेज प्रोफेसर का है, जिन्होंने वर्ष 2016 में श्रीचक्र मैरिज ब्यूरो (Sreechakra Marriage Bureau) की सेवाओं के लिए पंजीकरण कराया था। नौ साल के लंबे इंतजार और बार-बार मिलने वाले झूठे आश्वासनों के बाद, अंततः न्याय की जीत हुई है।
धोखे और झूठे आश्वासनों का सिलसिला
कन्नूर के रहने वाले इस प्रोफेसर ने आरोप लगाया कि ब्यूरो ने उन्हें कसरागॉड से एक उपयुक्त जीवनसाथी दिलाने का वादा किया था, लेकिन इसके बाद कभी कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। पीड़ित के अनुसार, हर साल ब्यूरो के कर्मचारी उन्हें यही कहकर टाल देते थे कि "अगली बार उपयुक्त प्रस्ताव अवश्य आएगा"। यह सिलसिला लगभग नौ वर्षों तक चला, जिससे न केवल उनका समय बर्बाद हुआ बल्कि उन्हें भारी मानसिक कष्ट भी झेलना पड़ा।
पारिवारिक त्रासदी और मानसिक पीड़ा
इस मामले का सबसे दुखद पहलू पीड़ित का व्यक्तिगत जीवन रहा। पीड़ित ने आयोग को बताया कि उनके वृद्ध माता-पिता उनके विवाह की प्रतीक्षा कर रहे थे। इस बीच, अक्टूबर 2025 में उनके पिता का कैंसर से निधन हो गया, जबकि उनकी बीमार माँ आज भी उनके विवाह की आस लगाए बैठी हैं। मैरिज ब्यूरो की लापरवाही ने न केवल उनके सामाजिक जीवन को प्रभावित किया, बल्कि उनके परिवार को गहरे भावनात्मक संकट में भी डाल दिया।
आयोग का कड़ा रुख और निर्णय
सुनवाई के दौरान, मैरिज ब्यूरो का प्रबंधन न तो आयोग के समक्ष उपस्थित हुआ और न ही कोई लिखित जवाब दाखिल किया। इस कारण आयोग ने मामले की सुनवाई एकपक्षीय (ex parte) रूप से की। आयोग ने पाया कि भुगतान की रसीद में सेवा की कोई नियम और शर्तें स्पष्ट नहीं थीं। सेवा में कमी (deficiency in service) को स्वीकार करते हुए, आयोग ने ब्यूरो को आदेश दिया कि वे ₹3,000 का पंजीकरण शुल्क वापस करें, ₹3,000 मानसिक पीड़ा के लिए और ₹2,000 मुकदमेबाजी के खर्च के रूप में प्रदान करें। यदि ब्यूरो भुगतान करने में विफल रहता है, तो राशि पर 9% वार्षिक ब्याज भी देना होगा।