शोधकर्ताओं ने ब्रिटिश भारतीय सेना के 9,909 भूले-बिसरे सैनिकों की पहचान की है, जिनके बलिदान को अब आधिकारिक रूप से मान्यता दी जाएगी।

एक सदी से भी अधिक समय बाद, इतिहास के पन्नों में दबे उन हजारों पंजाबी सैनिकों के बलिदान को न्याय मिल रहा है, जिन्होंने प्रथम विश्व युद्ध के दौरान अपनी जान गंवाई थी। शोधकर्ताओं और स्वयंसेवकों के एक समर्पित समूह ने ब्रिटिश भारतीय सेना के 9,909 ऐसे सैनिकों की पहचान की है, जिनका नाम अब तक आधिकारिक रिकॉर्ड से गायब था। इन सैनिकों के नाम अब कॉमनवेल्थ वॉर ग्रेव्स कमीशन (CWGC) के युद्ध में मारे गए सैनिकों के डेटाबेस में शामिल किए जा रहे हैं।

इतिहास की धूल झाड़ती एक ऐतिहासिक खोज

यह खोज केवल आंकड़ों का मिलान नहीं है, बल्कि उन परिवारों के लिए एक भावनात्मक यात्रा है जो दशकों से अपने पूर्वजों की नियति जानने को बेताब थे। शोधकर्ताओं ने पंजाब के विभिन्न हिस्सों में पुराने सैन्य रजिस्टरों की गहन जांच की। इस प्रक्रिया में UK पंजाब हेरिटेज एसोसिएशन के सदस्यों ने पाकिस्तान के लाहौर संग्रहालय में रखे पुराने चमड़े से बंधे रजिस्टरों को डिजिटल करने और उनका अध्ययन करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

विभाजन और रिकॉर्ड्स का बिखराव

प्रथम विश्व युद्ध के दौरान भारतीय उपमहाद्वीप से लगभग 14 लाख सैनिकों ने सेवा दी थी। हालांकि, 1947 के भारत-पाकिस्तान विभाजन ने इस ऐतिहासिक डेटा को दो हिस्सों में बांट दिया, जिससे कई रिकॉर्डों तक पहुंचना लगभग असंभव हो गया। विभाजन के कारण कई सैनिकों की कहानियाँ और उनके गांवों के नाम सार्वजनिक स्मृति से ओझल हो गए।

बदलता वैश्विक दृष्टिकोण और सम्मान

CWGC के इतिहासकारों के अनुसार, इनमें से अधिकांश सैनिक युद्ध के मैदान से दूर चोटों के कारण मारे गए थे, जिन्हें तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने 'युद्ध में मृत' (war dead) का दर्जा नहीं दिया था। अब इस नीति में बदलाव किया गया है। पहचाने गए सैनिकों में लगभग 25% सिख, 25% हिंदू और 40% मुस्लिम शामिल हैं। CWGC का कहना है कि यह कदम प्रथम विश्व युद्ध को केवल एक यूरोपीय संघर्ष के बजाय एक वैश्विक संघर्ष के रूप में देखने के प्रयास का हिस्सा है।