एक टीम ने चेंनई के दक्षिणी सीमा पर स्थित लगभग 25 बंद पथरखानों की जल भंडारण क्षमता, गुणवत्ता और जल नेटवर्क से जोड़ने की सम्भावना का विस्तृत अध्ययन शुरू किया है। यह पहल शहर की जल संकट समाधान में एक महत्त्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • चेंनई के 25 बंद पथरखानों की जल भंडारण क्षमता का मूल्यांकन किया गया।
  • IIT‑मद्रास के शोध ने जल गुणवत्ता और नेटवर्क कनेक्टिविटी पर फोकस किया।
  • पथरखानों को जल स्रोत में बदलने से जल ह्रास को 10‑20% तक घटाया जा सकता है।

चेंनई मेट्रोवॉटर ने अपने जल सुरक्षा योजना में बंद पथरखानों को एक वैकल्पिक स्रोत के रूप में शामिल किया है, विशेष रूप से कमजोर उत्तर‑पूर्वी मानसून के दौरान। इस योजना के पीछे प्रमुख शोधकर्ता एलैंगो लक्ष्मणन के नेतृत्व में IIT‑मद्रास की जल एवं हाइड्रॉलिक इंजीनियरिंग टीम ने दक्षिणी सीमाओं में स्थित तम्बरम, वंदालुर, नल्लाम्बक्कम, तिरुनीरमलाई, उनामांचेरी और कीरापक्कम जैसे 25 पथरखानों का विस्तृत सर्वेक्षण शुरू किया।

पृष्ठभूमि और महत्व

शहर के प्रमुख जलाशयों, विशेषकर चेम्बरम्बक्कम जलाशय, पर लगातार बढ़ते जल निकासी और उच्च वाष्पीकरण के कारण जल स्तर घट रहा है। इस कारण से, मेट्रोवॉटर ने सिखरायपुरम और एरुमैयूर में स्थित पथरखानों को बफ़र स्रोत के रूप में विकसित किया है, जो 0.3‑0.5 वर्ग किलोमीटर के छोटे क्षेत्र में 10‑20% तक वाष्पीकरण को सीमित कर सकते हैं। यह छोटे लेकिन रणनीतिक रूप से स्थित जल संग्रहण इकाइयाँ बड़े जलाशयों की तुलना में जल ह्रास को कम करने में मददगार साबित हो सकती हैं।

अध्ययन के मुख्य बिंदु

शोध टीम ने तीन प्रमुख पहलुओं पर केंद्रित किया है: (i) प्रत्येक पथरखे का भंडारण क्षमता, (ii) जल की गुणवत्ता और (iii) निकटतम जल आपूर्ति नेटवर्क से जोड़ने की तकनीकी सम्भावना। प्रारंभिक परिणाम दर्शाते हैं कि सिखरायपुरम और एरुमैयूर के संयुक्त भंडारण क्षमता लगभग 0.7 हजार मिलियन घन फुट है, जो 75% तक पूर्ण है। इन पथरखानों से प्रतिदिन लगभग 30 मिलियन लीटर (Sikkarayapuram) और 10 मिलियन लीटर (Erumaiyur) की आपूर्ति संभव है, जो क्रमशः एक वर्ष और 425 दिनों तक चल सकती है।

भविष्य की योजना और चुनौतियाँ

वर्तमान में सरकार की स्वीकृति की प्रतीक्षा में, 25 पथरखानों को एकीकृत करके एक बड़े भंडारण संरचना में बदलने की प्रस्तावना पर विचार किया जा रहा है। इसके अलावा, जल को पहले जलाशय से पथरखानों में स्थानांतरित करने की रणनीति अपनाई जाएगी, जिससे वाष्पीकरण के नुकसान को न्यूनतम किया जा सके। इस बीच, अंध्र प्रदेश से आने वाले कृष्णा नदी के अतिरिक्त जल प्रवाह ने शहर के जल भंडारण को 47% तक बढ़ा दिया है, जो इस नई पहल के कार्यान्वयन को और अधिक प्रासंगिक बनाता है।

विशेषज्ञों की राय

जल संसाधन विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पथरखानों को उचित रूप से तैयार किया जाए तो ये न केवल मौसमी जल अभाव को कम करेंगे बल्कि दीर्घकालिक जल सुरक्षा में भी योगदान देंगे। हालांकि, जल की गुणवत्ता नियंत्रण, अवसंरचना निवेश और स्थानीय समुदायों की भागीदारी को सुनिश्चित करना आवश्यक होगा।