डिजिटल प्रिंटिंग और LED डिस्प्ले के बढ़ते प्रभाव के बीच, हैदराबाद के पारंपरिक साइनबोर्ड पेंटर्स अपनी कला को बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। दशकों से शहर की पहचान रहे इन कलाकारों की जीविका अब खतरे में है।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • डिजिटल फ्लेक्स और LED डिस्प्ले के कारण हाथ से पेंट किए जाने वाले साइनबोर्डों की मांग में भारी कमी आई है।
  • एक समय में शहर की पहचान रहे ये कलाकार अब ठेकेदारी प्रथा और कम होती आय से जूझ रहे हैं।
  • कौशल और स्थायित्व के बावजूद, यह पारंपरिक व्यवसाय धीरे-धीरे विलुप्त होने की कगार पर है।

हैदराबाद की गलियों में कभी रंगों की एक अलग ही चमक हुआ करती थी। दुकानों के नाम, फिल्मों के बड़े-बड़े पोस्टर और राजनीतिक बैनर—सब कुछ कलाकारों के हाथों के जादू से सजीव हो उठता था। लेकिन आज, हैदराबाद की सड़कों का दृश्य बदल चुका है। डिजिटल प्रिंटिंग, रेडियम प्लेट्स और चमचमाते LED डिस्प्ले ने उन कलाकारों की जगह ले ली है, जो कभी ब्रश और रंगों के दम पर अपनी पहचान बनाते थे।

एक सुनहरे दौर की यादें

नंपल्ली के मोहम्मद नजीर (Nazeer Arts) जैसे अनुभवी कलाकार उस दौर को याद करते हैं जब उनका काम उनकी पहचान हुआ करता था। नजीर बताते हैं कि 80 और 90 के दशक में उनके द्वारा बनाए गए साइनबोर्ड्स की एक अलग ही साख थी। एक दिलचस्प किस्सा साझा करते हुए वे कहते हैं कि उनके द्वारा पेंट किए गए फलों के चित्र इतने असली लगते थे कि राह चलते जानवर भी उन्हें खाने की कोशिश करते थे। उस दौर में, एक कलाकार महीने में 60 से 70 असाइनमेंट पूरे करता था और उनकी कला की सराहना पूरे शहर में होती थी।

डिजिटल क्रांति और बदलता व्यापार मॉडल

तकनीकी प्रगति ने काम को तेज और सस्ता तो बना दिया, लेकिन इसने कलाकारों की जीविका पर गहरा प्रहार किया है। नजीर के अनुसार, उनके मूल काम का लगभग 80% हिस्सा अब गायब हो चुका है। पहले ग्राहक सीधे कलाकारों से संपर्क करते थे, लेकिन अब यह काम जटिल ठेकेदारी प्रथाओं में फंस गया है। सरकारी टेंडर से लेकर मुख्य ठेकेदार और फिर पेंटिंग ठेकेदार तक, हर स्तर पर कलाकारों की कमाई का एक हिस्सा कट जाता है, जिससे अंत में कलाकार के पास बहुत कम मजदूरी बचती है।

कला बनाम तकनीक: क्या है भविष्य?

हालाँकि, यह कला पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। कुछ व्यवसायी आज भी हाथ से पेंट किए गए बोर्डों को प्राथमिकता देते हैं क्योंकि वे डिजिटल प्रिंटिंग की तुलना में अधिक टिकाऊ होते हैं। नंपल्ली के 'मदीना मटन शॉप' जैसे दुकानदार आज भी नजीर द्वारा एक दशक पहले बनाए गए बोर्ड का उपयोग कर रहे हैं। राजन कुमार साही और निजामुद्दीन अदली जैसे कलाकार अब स्कूलों की दीवारों और भित्ति चित्रों (murals) जैसे नए क्षेत्रों में अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रहे हैं।

यह केवल एक व्यवसाय का बदलना नहीं है, बल्कि एक सांस्कृतिक विरासत का लुप्त होना है। जहाँ एक ओर तकनीक ने सुविधा दी है, वहीं दूसरी ओर इसने उन हाथों की कला छीन ली है जिन्होंने दशकों तक शहर के दृश्य परिदृश्य (visual landscape) को आकार दिया था।