भारत-यूके व्यापक आर्थिक व व्यापार समझौता (CETA) 15 जुलाई को लागू हुआ, जिससे 99% भारतीय वस्तु‑वर्गों पर यूके के टैरिफ हटाए गए। यह समझौता किसानों, मत्स्यकों और छोटे‑मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) को प्रमुख लाभ देता है, जिससे निर्यात‑समर्थन और निवेश‑पर्यावरण में नई संभावनाएँ खुलेंगी।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- यूके ने 99% भारतीय टैरिफ लाइनों को हटाया, जिससे 97.7% व्यापार मूल्य मुक्त हो गया।
- कृषि, मत्स्य पालन और एमएसएमई को प्राथमिक लाभार्थी माना गया है।
- डबल कॉन्ट्रिब्यूशन कन्वेंशन के तहत 75,000 से अधिक भारतीय पेशेवरों को सामाजिक सुरक्षा में राहत मिली।
भारत-यूके व्यापक आर्थिक व व्यापार समझौता (CETA) 15 जुलाई 2026 को आधिकारिक रूप से लागू हुआ, साथ ही इसका सहायक सामाजिक सुरक्षा समझौता – डबल कॉन्ट्रिब्यूशन कन्वेंशन (DCC) भी प्रभावी हो गया। भारत के वाणिज्य सचिव राजेश अग्रवाल ने इसे "स्वर्ण मानक" कहा, क्योंकि यह 30 अध्यायों को कवर करता है, जो केवल टैरिफ कटौती से कहीं अधिक व्यापक है।
समझौते की संरचना और प्रमुख प्रावधान
FTA (Free Trade Agreement) दो या अधिक देशों के बीच वस्तुओं व सेवाओं पर टैरिफ व अन्य बाधाओं को घटाने या हटाने का समझौता है। CETA इस अवधारणा को आगे बढ़ाते हुए सेवाएँ, डिजिटल व्यापार, सरकारी खरीद, बौद्धिक संपदा, निवेश, श्रम, पर्यावरण और लैंगिक समानता जैसे क्षेत्रों को भी शामिल करता है, जिससे यह एक व्यापक आर्थिक साझेदारी (CEPA) जैसा बन जाता है।
टैरिफ में बड़े बदलाव
यूके ने भारतीय 99% टैरिफ लाइनों को तत्काल हटाया, जिससे लगभग 97.7% व्यापार मूल्य बिना शुल्क के गुजरता है। प्रक्रिया में प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों पर 70% तक के टैरिफ, समुद्री उत्पादों पर 21.5%, इंजीनियरिंग सामान पर 18% और ऑटो घटकों पर 16% जैसी उच्च दरें शामिल थीं। भारत ने भी 89.5% टैरिफ लाइनों को खोल दिया, लेकिन केवल 24.5% मूल्य पर तुरंत टैरिफ‑मुक्त पहुँच मिली, शेष हिस्से को 5‑10 वर्षों में चरणबद्ध किया जाएगा।
संवेदनशील क्षेत्रों की सुरक्षा
दोनों देशों ने कुछ संवेदनशील क्षेत्रों को समझौते से बाहर रखा। भारत ने डेयरी, अनाज, दालें, तेल, फल, सोना, ज्वेलरी, लैब‑ग्रोन डायमंड, स्मार्टफोन और समुद्री पोत जैसे प्रमुख वस्तुओं को टैरिफ राहत से मुक्त नहीं किया। यूके ने भी कुछ कृषि‑उत्पादों को धीरे‑धीरे हटाने का वचन दिया है।
गैर‑टैरिफ बाधाओं का समाधान
सैनिटरी और फाइटोसैनिटरी (SPS) मानकों और तकनीकी बाधाओं (TBT) को संबोधित करने के लिए विशेष अध्याय बनाए गए हैं, जिससे गुणवत्ता या सुरक्षा मानकों को व्यापार प्रतिबंध में बदलने से रोका जा सके। मूल नियम (Rules of Origin) को सरल बनाकर निर्यातकों को स्व-प्रमाणन की सुविधा दी गई है, और अधिकृत आर्थिक ऑपरेटरों को तेज़ कस्टम क्लियरेन्स मिलता है।
कृषि, किसान और एमएसएमई पर प्रभाव
कृषकों को लाभ इस बात में निहित है कि उनके उत्पादों को यूके बाजार में कम या बिना टैरिफ के निर्यात किया जा सकेगा, जिससे प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ेगी। विशेष रूप से फल, सब्ज़ी, मसाले और जैविक उत्पादों के लिए नई बाजार‑संभावनाएँ खुलेंगी। मत्स्यकों को समुद्री उत्पादों पर 21.5% टैरिफ हटाने से निर्यात‑आय में वृद्धि की उम्मीद है।
एमएसएमई के लिए यह समझौता दो‑तरफ़ा लाभ लाएगा: उत्पादन‑उत्पन्न प्रोत्साहन (PLI) स्कीम के तहत चरणबद्ध टैरिफ रिहाई और डिजिटल सेवाओं में आसान प्रवेश, जिससे छोटे उद्यमों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने का अवसर मिलेगा।
भविष्य की दिशा और रणनीतिक महत्व
यह समझौता भारत के लिए विकसित अर्थव्यवस्था के साथ सबसे बड़ा व्यापार समझौता माना जाता है, जो न केवल वस्तुओं बल्कि सेवाओं, निवेश और तकनीकी सहयोग को भी शामिल करता है। यह भारत‑यूके विज़न 2035 के साथ तालमेल रखता है, जिसमें रक्षा, जलवायु और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में सहयोग को भी विस्तारित किया गया है।
अंत में, समझौते के कार्यान्वयन की निगरानी भारत‑यूके संयुक्त समिति द्वारा की जाएगी, जिसमें नियम‑उत्पत्ति, श्रम, बौद्धिक संपदा और लैंगिक समानता जैसे क्षेत्रों के उपसमितियाँ शामिल होंगी। किसी भी परिवर्तन के लिए दोनों पक्षों की पारस्परिक स्वीकृति आवश्यक होगी, और स्वीकृति के 60 दिनों बाद वह प्रभावी माना जाएगा।