मदुरै बेंच ने पालनी मठ द्वारा दायर अपील स्वीकार कर 1.35 एकड़ की विवादित बिक्री डीड को निरस्त कर दिया। यह फैसला कोर्ट‑सुब‑रजिस्ट्री की कार्यवाही की वैधता पर सवाल उठाता है।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- मद्रास हाई कोर्ट ने 1.35 एकड़ पालनी मठ की जमीन के बिक्री दस्तावेज़ को रद्द किया।
- सिंगल बेंच के आदेश को निरस्त करने का कारण अपीलकर्ता को पक्ष के रूप में नहीं शामिल करना था।
- सब‑रजिस्ट्री अधिकारी को निलंबित किया गया, जबकि मामले की सुनवाई जुलाई १७ को निर्धारित है।
मदुरै स्थित मद्रास हाई कोर्ट ने बुधवार को अरुल्मिगु धंधापानी स्वामिगाल मदम् (पालनी मठ) की अपील स्वीकार की और 1.35 एकड़ ज़मीन के विवादास्पद बिक्री दस्तावेज़ को “नल एंड वॉयड” (null and void) घोषित किया। यह निर्णय एकल बेंच के पूर्व आदेश के विरुद्ध आया, जिसने सब‑रजिस्ट्री को दस्तावेज़ पंजीकृत करने का निर्देश दिया था।
पृष्ठभूमि
यह भूमि, जो दिंडीगुुल जिले के पालनी में स्थित है, मठ के स्वामित्व में रही थी। 2025 में कुछ निजी व्यक्तियों के नाम पर एक बिक्री डीड तैयार किया गया, जो सब‑रजिस्ट्री द्वारा पंजीकरण के लिए प्रस्तुत किया गया। मठ ने दावा किया कि यह डीड अनधिकृत रूप से तैयार किया गया था और मूल मालिकाना अधिकारों को उल्लंघन करता है।
कानूनी प्रक्रिया
मध्यस्थ न्यायालय के दो न्यायाधीश, सी.वी. कार्तिकेयन और आर. सख्तिवेल, ने मठ की अपील को मंजूरी दी। उन्होंने कहा कि एकल बेंच ने अपीलकर्ता को पक्ष के रूप में नहीं बुलाया और सब‑रजिस्ट्री ने आपत्तियों को अनदेखा कर पंजीकरण जारी किया। इस कारण से आदेश को अस्थायी रूप से रद्द किया गया।
प्रमुख दायित्व
मठ ने तर्क दिया कि बिक्री डीड निजी ट्रस्ट के संपत्ति को बेचे जाने जैसा बना था, जबकि वास्तविक स्वामित्व अभी भी मठ के पास था। इसके अतिरिक्त, मठ ने यह भी उजागर किया कि डीड में यह तथ्य छुपाया गया था कि जमीन का वास्तविक कब्ज़ा थक्कर परिवार के हाथ में था। इस प्रकार, पंजीकरण से आगे अनावश्यक कानूनी उलझनें उत्पन्न होती।
प्रशासनिक परिणाम
डॉक्यूमेंट पंजीकरण करने वाले सब‑रजिस्ट्री अधिकारी, जस्टिन मणिकंदन सुब्रमणियन, ने हाई कोर्ट से एंटिसिपेटरी बॉल की मांग की और बाद में निलंबित कर दिया गया। इसी तरह, जिला रजिस्ट्री अधिकारी सासिकला को भी निलंबित किया गया। न्यायालय ने अपराध शाखा‑क्राइम इन्फ़ॉर्मेशन डिपार्टमेंट से प्रतिक्रिया मांगी और मामला 17 जुलाई को पुनः सुनवाई के लिए निर्धारित किया।
यह फैसला धार्मिक संस्थानों की संपत्ति अधिकारों की सुरक्षा के साथ-साथ प्रशासनिक प्रक्रियाओं की पारदर्शिता पर प्रकाश डालता है, जिससे भविष्य में समान विवादों को रोकने की आशा है।