संविधान में संशोधन करने का प्रस्ताव एक ही राष्ट्रीय और राज्य चुनावों को जोड़ने का है, परन्तु यह वास्तविक चुनावी खामियों जैसे असीमित खर्च, काले धन और राजनीतिक अपराध को नहीं छूता। लेख में आर्थिक लाभ, लागत‑बचत और संवैधानिक जोखिमों की गहराई से जांच की गई है।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- एक ही चुनाव से खर्च में उल्लेखनीय बचत नहीं
- भ्रष्टाचार और काले धन की समस्या बनी रहती है
- संघीय ढाँचा और राज्य स्तर की विविधता खतरे में
भारत की संसद इस समय संविधान (129वें संशोधन) बिल पर विचार कर रही है, जिसका उद्देश्य लोकसभा और सभी राज्य सभाओं के चुनावों को एक साथ आयोजित करना है। यह बिल दो‑तिहाई बहुमत और आधे राज्यों की स्वीकृति की माँग करता है, जिससे इसकी सफलता अनिश्चित रह जाती है। उच्च‑स्तरीय समिति (HLC) ने चार प्रमुख लाभों – लागत बचत, नीति‑स्थगन से राहत, प्रशासनिक बोझ में कमी, और आर्थिक विकास – का दावा किया है, परन्तु इन दावों की जाँच अत्यंत आवश्यक है।
आर्थिक विकास का मिथक
HLC की रिपोर्ट एक अध्ययन का हवाला देती है, जिसमें कहा गया है कि एक साथ चुनाव होने पर वास्तविक जीडीपी वृद्धि लगभग 1.5 प्रतिशत अंक अधिक होती है। यह निष्कर्ष ऐतिहासिक तथ्यों के साथ टकराता है। 1952‑1967 के समकालिक चुनावों के दौरान भारत ने औसत 3.5 % की “हिंदू वृद्धि दर” देखी, जबकि 2003‑2011 के असिंक्रोनस चुनावों में 8‑9 % की तेज़ी प्राप्त हुई। इस अवधि में व्यापार उदारीकरण, आईटी बूम, वैश्विक पूँजी प्रवाह और 1991 के आर्थिक सुधार जैसे बड़े कारक कार्यरत थे, जिन्हें सरल‑समीकरण में नहीं घटाया जा सकता।
वास्तविक लागत‑बचत कहाँ है?
सरकारी चुनाव खर्च राष्ट्रीय बजट का 0.1 % से भी कम है, जैसा कि चुनाव आयोग (ECI) के आंकड़े दर्शाते हैं। अधिकतर खर्च उम्मीदवारों और पार्टियों द्वारा किया जाता है, जहाँ औसत आधिकारिक खर्च अनुमत सीमा का 50 % है। इसका अर्थ है कि अधिकांश धन ‘काला धन’ के रूप में गुप्त रूप से चलता है; मीडिया स्टडीज के अनुसार 2024 के लोकसभा चुनाव में ही यह राशि ₹1 लाख करोड़ से अधिक हो सकती है। इसलिए, चाहे चुनाव सालाना हों या पाँच‑साल में एक बार, काले धन की समस्या अपरिवर्तित रहती है।
मॉडल कोड ऑफ़ कंडक्ट (MCC) का दुष्प्रभाव
MCC के कारण सरकार को लगभग 45‑60 दिनों तक नई नीतियों की घोषणा से रोकना पड़ता है। वर्तमान में विभिन्न राज्यों में यह प्रतिबंध साल भर के लगभग चार महीने तक रहता है। यदि ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ लागू हो जाता है, तो यह रोक पूरी राष्ट्र में एक साथ पाँच साल तक लागू होगी, जिससे विकासात्मक घोषणाओं में राष्ट्रीय स्तर पर बड़े व्यवधान की संभावना बढ़ेगी। इसे “नीति‑स्थगन” कहना लोकतांत्रिक नियंत्रण को प्रशासनिक अकार्यक्षमता के साथ ग़लत मिलाता है।
संवैधानिक और संघीय चुनौतियाँ
केसवनंदा भारती के फैसले ने संसद को बताया कि लोकतांत्रिक व्यवस्था और स्वतंत्र चुनाव संविधान की मूल संरचना का हिस्सा हैं, जिसे संशोधन नहीं किया जा सकता। एक ही चुनाव के तहत यदि कोई सरकार अपना बहुमत खो देती है, तो वह या तो बिना वैध mandate के जारी रहेगी या राष्ट्रपति शासन लागू होगा – दोनों ही विकल्प लोकतांत्रिक सिद्धांतों के विरुद्ध हैं। HLC द्वारा प्रस्तावित “संरचनात्मक अविश्वास प्रस्ताव” (जर्मनी मॉडल) भारत की पार्लियामेंटरी परम्परा को विकृत कर सकता है। साथ ही, कई राज्य विधानसभाओं के कार्यकाल को बढ़ाना या घटाना, संविधान के अनुच्छेद 83 और 172 में स्पष्ट शब्द ‘अब नहीं’ के विरुद्ध है, जिससे मतदाता का संविदात्मक अधिकार उल्लंघन होता है। अंत में, समकालिक चुनावों से क्षेत्रीय पार्टियों और संघीय संरचना पर दबाव बढ़ेगा, जिससे भारत की विविधता को नुकसान पहुँच सकता है।
इन सभी पहलुओं को देखते हुए, ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ केवल एक प्रतीकात्मक कदम है, जो मौलिक चुनावी रोगों को ठीक नहीं कर पाएगा। वास्तविक सुधार के लिए पार्टी वित्तीय पारदर्शिता, काली धन पर कड़ी निगरानी और स्वतंत्र चुनाव आयोग जैसी लक्षित पहलें आवश्यक हैं।