सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि अवैध अतिक्रमण हटाने के लिए बुलडोजर का उपयोग किया जा सकता है, लेकिन कानून के नाम पर किसी विशेष व्यक्ति या समुदाय को निशाना बनाना गलत है।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- सुप्रीम कोर्ट ने बुलडोजर कार्रवाई पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने से इनकार कर दिया।
- अदालत ने कहा कि कार्रवाई कानून के दायरे में होनी चाहिए, न कि किसी को दंडित करने के लिए 'चुनिंदा' तरीके से।
- सभी अवमानना याचिकाओं को संबंधित उच्च न्यायालयों (High Courts) को स्थानांतरित कर दिया गया है।
- अदालत ने जोर दिया कि प्रत्येक मामले में 'ड्यू प्रोसेस' यानी उचित कानूनी प्रक्रिया का पालन होना अनिवार्य है।
नई दिल्ली: भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण और संवेदनशील मामले में अपना रुख स्पष्ट कर दिया है। न्यायालय ने 'बुलडोजर कार्रवाई' पर किसी भी प्रकार के पूर्ण प्रतिबंध (blanket ban) लगाने से इनकार कर दिया है, लेकिन साथ ही प्रशासन को सख्त चेतावनी भी दी है। शीर्ष अदालत ने कहा कि कानून के शासन को बनाए रखने के लिए अतिक्रमण हटाने हेतु बुलडोजर का उपयोग किया जा सकता है, परंतु इसका उपयोग 'चुनिंदा' तरीके से किसी व्यक्ति या समूह को लक्षित करने के लिए नहीं किया जाना चाहिए।
कानूनी प्रक्रिया और न्याय का सिद्धांत
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि बुलडोजर का उपयोग तब आवश्यक हो जाता है जब अधिकारियों और अवैध अतिक्रमणकारियों के बीच 'सुविधाजनक भ्रष्टाचार' कानून के शासन को बाधित करता है। हालांकि, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा, "कानून लागू करने की आड़ में व्यक्तियों के चरित्र चित्रण या उन्हें दंडित करने की प्रवृत्ति नहीं होनी चाहिए। मुख्य प्रश्न यह है कि क्या संबंधित व्यक्ति के पास कानूनी अधिकार था और क्या कानून द्वारा निर्धारित उचित प्रक्रिया (Due Process) का पालन किया गया था?"
उच्च न्यायालयों को जिम्मेदारी सौंपी
अदालत ने उन याचिकाओं को खारिज कर दिया जिनमें आरोप लगाया गया था कि अधिकारी नवंबर 2024 के ऐतिहासिक दिशा-निर्देशों का उल्लंघन कर रहे हैं। पीठ ने स्पष्ट किया कि प्रत्येक मामले के तथ्य अलग होते हैं और इनमें गहन जांच की आवश्यकता होती है। इसलिए, सर्वोच्च न्यायालय ने सभी लंबित अवमानना याचिकाओं को संबंधित उच्च न्यायालयों को स्थानांतरित कर दिया है। अदालत ने कहा कि उच्च न्यायालयों के पास रिकॉर्ड मंगवाने और साक्ष्यों की जांच करने के लिए आवश्यक शक्तियां हैं, और वे यह तय कर सकते हैं कि क्या प्रशासन ने सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों का उल्लंघन किया है या नहीं।
विवादित मामले और दलीलें
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता हुजेफा अहमदी और संजय हेगड़े जैसे वकीलों ने गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने तर्क दिया कि कई मामलों में बुलडोजर कार्रवाई राजनीतिक रंजिश या सार्वजनिक घोषणाओं के बाद 'बदले की भावना' से की गई प्रतीत होती है। कुछ मामलों में तो यह भी आरोप लगाया गया कि विध्वंस की प्रक्रिया को मीडिया में लाइव दिखाया गया और इसे उत्सव की तरह मनाया गया। हालांकि, बेंच ने इन आरोपों पर कहा कि इनके लिए विस्तृत तथ्यात्मक जांच की आवश्यकता है, जो उच्च न्यायालयों के अधिकार क्षेत्र में आता है।