स्टैंड-अप कॉमेडियन कुणाल कामरा द्वारा 'सहयोग पोर्टल' की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर बॉम्बे हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार को जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- बॉम्बे हाई कोर्ट ने 'सहयोग पोर्टल' की वैधता को चुनौती देने वाली कुणाल कामरा की याचिका पर केंद्र से जवाब मांगा है।
- याचिका में आरोप लगाया गया है कि पोर्टल का उपयोग ऑनलाइन सेंसरशिप और बिना किसी सुरक्षा उपाय के सामग्री हटाने के लिए किया जा रहा है।
- आईटी नियमों में संशोधन के तहत अब आपत्तिजनक सामग्री को 36 घंटों के भीतर हटाना अनिवार्य है।
- केंद्र सरकार ने 29 जुलाई तक अपना हलफनामा दाखिल करने का आश्वासन दिया है।
मुंबई स्थित बॉम्बे हाई कोर्ट ने गुरुवार को एक महत्वपूर्ण सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह स्टैंड-अप कॉमेडियन कुणाल कामरा द्वारा दायर याचिका पर अपना हलफनामा पेश करे। कामरा ने सरकार के 'सहयोग पोर्टल' की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी है, जिसे उन्होंने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रहार बताया है।
सेंसरशिप और मौलिक अधिकारों का संघर्ष
कुणाल कामरा के वकील, नवरोज़ सीरवाई ने अदालत के समक्ष तर्क दिया कि यह मामला अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि याचिका फरवरी में दायर की गई थी, लेकिन बार-बार निर्देश दिए जाने के बावजूद सरकार ने अब तक अपना जवाब दाखिल नहीं किया है। कामरा का मुख्य आरोप यह है कि 'सहयोग पोर्टल' सरकार के लिए एक ऐसा उपकरण बन गया है जिसका उपयोग बिना किसी उचित प्रक्रिया के ऑनलाइन सामग्री को सेंसर करने के लिए किया जा रहा है।
याचिका में विशेष रूप से सूचना प्रौद्योगिकी (IT) नियमों में किए गए संशोधनों पर सवाल उठाए गए हैं। इन नए नियमों के अनुसार, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों या ऑनलाइन मध्यस्थों को किसी भी 'आपत्तिजनक' सामग्री को महज 36 घंटों के भीतर हटाना होगा। कामरा का तर्क है कि यह प्रक्रिया अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत गारंटीकृत बोलने की स्वतंत्रता का उल्लंघन करती है, क्योंकि इसमें प्रभावित पक्ष को सुनवाई का अवसर नहीं दिया जाता है।
सहयोग पोर्टल क्या है और विवाद क्यों है?
इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय द्वारा 2024 में लॉन्च किया गया 'सहयोग पोर्टल' ऑनलाइन आपत्तिजनक सामग्री को तेजी से ब्लॉक करने के उद्देश्य से बनाया गया था। हालांकि, आलोचकों और कामरा का कहना है कि यह पोर्टल 'एकतरफा कार्रवाई' (unilateral takedown) की अनुमति देता है। इसमें सामग्री के मूल निर्माता को कोई पूर्व नोटिस नहीं दिया जाता और न ही ब्लॉक करने से पहले कोई तर्कसंगत आदेश पारित किया जाता है, जो प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विरुद्ध है।
अदालत ने केंद्र की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल अनिल सिंह की दलीलों को सुना और मामले की अगली सुनवाई के लिए 14 अगस्त की तारीख तय की है। इस फैसले का परिणाम भारत के डिजिटल भविष्य और इंटरनेट पर सरकारी नियंत्रण की सीमा तय करने में निर्णायक साबित होगा।