जंतर मंचर में सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल ने शिक्षा प्रणाली और लद्दाख की राज्यता मुद्दों को फिर से उजागर किया है। लोकतांत्रिक शासन में संवाद को दांव-परिवर्तन के उपकरण के बजाय कर्तव्य मानना आवश्यक है, नहीं तो असंतोष का दायरा बढ़ता रहेगा।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- सोनम वांगचुक ने लद्दाख की राज्यता और NEET लीक के खिलाफ व्यापक मांगें रखी हैं।
- सरकार का मौन और विरोधी संवाद का रवैया लोकतंत्र की कमजोरी को दर्शाता है।
- संवाद और समझौता ही स्थायी समाधान का एकमात्र मार्ग है।
जंतर मंचर में सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल अब दूसरे दिन में प्रवेश कर चुकी है, जबकि केंद्र सरकार अपनी कठोर चुप्पी बनाए हुए है। वांगचुक, जो लद्दाख की राज्यता, छठे अनुसूची की सुरक्षा और हाल ही में NEET प्रश्नपत्र लीक के खिलाफ आंदोलन कर रहे हैं, पहले भी कई बार सत्ता के साथ टकराते रहे हैं।
पिछले संघर्षों की पृष्ठभूमि
पिछले वर्ष लद्दाख में राज्यता की माँग और छठे अनुसूची की सुरक्षा के लिए आयोजित विरोधों में वांगचुक की भागीदारी के बाद उन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) के तहत गिरफ्तार किया गया था। यह कदम सरकार द्वारा विरोध को दमन करने की प्रवृत्ति को दर्शाता है, जहाँ उन्हें “विरोधी-राष्ट्रवादी” के लिबास में लेबल किया गया। मार्च 2026 में लगभग 170 दिनों के बाद उनकी जमानती रिहाई हुई, लेकिन यह केवल औपचारिक कदम था, वास्तविक संवाद की कमी बनी रही।
NEET लीक और शिक्षा सुधार की मांग
इस साल की NEET प्रश्नपत्र लीक ने शिक्षा प्रणाली की गहरी खामियों को उजागर किया। वांगचुक ने इस लीक को केवल एक घटना नहीं, बल्कि एक बिगड़ती शैक्षणिक ढांचे की संकेतिका माना है। उन्होंने मौजूदा परीक्षा प्रक्रिया, पाठ्यक्रम और उत्तरदायित्व प्रणाली में व्यापक सुधार की माँग की है, जो केवल सरकार की सक्रिय भागीदारी से ही संभव है।
सरकार का मौजूदा प्रतिक्रिया पैटर्न
बीजेपी-प्रधान सरकार ने अक्सर विरोध को दमन करने के बजाय समझौता करने में असफलता दिखाई है। चाहे वह किसानों का आंदोलन हो, नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) के विरोधी प्रदर्शनों का मामला हो, या अब वांगचुक का आंदोलन, सभी में सरकार ने अपने विरोधियों के साथ संवाद स्थापित करने की बजाय “दिखावे” को प्राथमिकता दी है। यह रवैया न केवल लोकतांत्रिक मूल्यों को कमजोर करता है, बल्कि जनता के भरोसे को भी क्षीण करता है।
संवाद की आवश्यकता और आगे का रास्ता
लोकतंत्र में सरकार की बुनियादी ज़िम्मेदारी संवाद, सुनना और समझौता करना है, न कि केवल सौदेबाज़ी के साधन के रूप में संवाद को इस्तेमाल करना। वांगचुक और उनके समर्थक केवल लद्दाख या शिक्षा सुधार के मुद्दे नहीं, बल्कि एक व्यापक सामाजिक बदलाव का प्रतिनिधित्व करते हैं। यदि सरकार इस अवसर को हाथ से जाने दे, तो असंतोष की लहरें और अधिक तीव्र होंगी।