बॉम्बे हाई कोर्ट ने महाराष्ट्र पुलिस को शालार्थ पोर्टल से जुड़ी ‘अजनबी’ शिकायतों के आधार पर FIR दर्ज करने के लिए कड़ी फटकार लगाई। न्यायालय ने अधिकारियों को आदेश दिया कि वे ऐसे बेतुके मामलों को रोकें, जिससे शैक्षणिक संस्थानों और शिक्षकों को अनावश्यक तनाव से बचाया जा सके।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • बॉम्बे हाई कोर्ट ने शालार्थ FIRs को ‘अजनबी’ शिकायतों पर दर्ज करने के लिए पुलिस को फटकार लगाई।
  • न्यायालय ने नाशिक (ग्रामीण) के एसपी को अगली सुनवाई में उपस्थित रहने का आदेश दिया।
  • शिक्षक और शैक्षणिक संस्थानों को बेतुकी शिकायतों से होने वाले मानसिक दबाव को रोकने हेतु विशेष जांच टीम (SIT) को दिशा-निर्देश मिले।

बॉम्बे हाई कोर्ट ने फिर से महाराष्ट्र पुलिस पर तीखा प्रहार किया, जब उसने शालार्थ पोर्टल के माध्यम से शैक्षणिक संस्थानों के कर्मचारियों की नियुक्तियों को लेकर ‘अजनबी’ शिकायतों के आधार पर FIR दर्ज करने की प्रक्रिया जारी रखी। यह पोर्टल स्कूल कर्मचारियों के वेतन व सेवा रिकॉर्ड को डिजिटल रूप से प्रबंधित करने के लिये स्थापित किया गया था, परन्तु अब इसे वैध शिकायतों के बिना दुरुपयोग का साधन माना जा रहा है।

पृष्ठभूमि और अदालत के नोट्स

अध्यक्ष न्यायाधीश रवींद्र वी घुगे और न्यायाधीश गौतम ए अंकड़ ने इस मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि पुलिस "शायद सोच रही है कि वे वास्तविक लॉर्ड हैं और कानून उनके अधीन है"। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि इस तरह की बेतुकी FIRs न केवल शिक्षकों को डिप्रेशन जैसी मानसिक समस्याओं की ओर धकेलती हैं, बल्कि शैक्षणिक संस्थानों की कार्यशैली को भी बाधित करती हैं।

विशेष जांच टीम (SIT) की भूमिका

मई 2026 में उसी न्यायालय ने शालार्थ पोर्टल के दुरुपयोग की जांच के लिये गठित विशेष जांच टीम (SIT) को भी फटकार लगाई थी। टीम को निर्देश दिया गया था कि वह ‘अजनबी’ शिकायतों को समाप्त करने के लिये कड़ी कार्रवाई करे, क्योंकि ये शिकायतें अक्सर व्यक्तिगत कारणों या फिर extortion (वसूली) के तहत दर्ज की जाती हैं।

सरकारी प्रतिक्रिया और आगे की कार्यवाही

नाशिक (ग्रामीण) के एसपी को अगली सुनवाई में 20 जुलाई को उपस्थित रहने का आदेश दिया गया। साथ ही, राज्य के मुख्य सचिव और पुलिस निदेशक (DGP) को भी इस मुद्दे पर विशेष ध्यान देने का निर्देश मिला। राज्य सरकार ने एक सरकारी संकल्प (GR) जारी किया था, जिसमें पुलिस को अजनबी शिकायतों को न मानने का निर्देश दिया गया था, परन्तु अदालत ने यह बताया कि कई अधिकारी अभी भी इस संकल्प का उल्लंघन कर रहे हैं।

भविष्योन्मुखी प्रभाव

यदि पुलिस इस दिशा-निर्देश को नहीं मानती, तो शैक्षणिक संस्थानों में नियुक्तियों के संबंध में अनावश्यक कानूनी उलझनें बढ़ सकती हैं, जिससे शिक्षक वर्ग का मनोबल गिर सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस मामले में न्यायालय का दृढ़ रुख भविष्य में अन्य सार्वजनिक संस्थानों में भी समान दुरुपयोग को रोकने में सहायक सिद्ध होगा।