दिल्ली के जंतर-मंतर पर सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक का आमरण अनशन 19वें दिन भी जारी है। नीट-यूजी 2026 पेपर लीक मामले और शिक्षा प्रणाली में सुधारों को लेकर शुरू हुआ यह आंदोलन अब एक राष्ट्रीय बहस का रूप ले चुका है।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- सोनम वांगचुक दिल्ली के जंतर-मंतर पर पिछले 19 दिनों से अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर हैं।
- यह आंदोलन नीट-यूजी 2026 पेपर लीक विवाद और शिक्षा प्रणाली में सुधार की मांगों को लेकर शुरू हुआ है।
- अत्यधिक गर्मी और गिरते स्वास्थ्य के बावजूद, वांगचुक ने समर्थकों से 20 जुलाई को संसद मार्च में शामिल होने की अपील की है।
दिल्ली की दमघोंटू उमस और भीषण गर्मी के बीच, जंतर-मंतर पर 59 वर्षीय पर्यावरणविद् और शिक्षा सुधारक सोनम वांगचुक का आमरण अनशन 19वें दिन में प्रवेश कर चुका है। जंतर-मंतर की अमानवीय परिस्थितियों में इतने दिनों तक बिना अन्न के रहना उनकी अटूट प्रतिबद्धता को दर्शाता है। यह विरोध प्रदर्शन केवल एक व्यक्ति की जिद नहीं, बल्कि देश की जर्जर हो चुकी परीक्षा प्रणाली के खिलाफ उपजा एक आक्रोश है।
आंदोलन की पृष्ठभूमि और नीट-यूजी विवाद
इस व्यापक विरोध प्रदर्शन की पृष्ठभूमि नीट-यूजी 2026 परीक्षा के पेपर लीक विवाद से जुड़ी है। 22 लाख से अधिक छात्रों के भविष्य को प्रभावित करने वाले इस घोटाले ने देश की राष्ट्रीय परीक्षण प्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। छात्रों की आत्महत्याओं और सरकार की कथित उदासीनता ने आग में घी डालने का काम किया है। इसी बीच, 'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) जैसे प्रतीकात्मक छात्र संगठनों ने इस विरोध को एक नया और आक्रामक मंच प्रदान किया है।
जंतर-मंतर की कठिन परिस्थितियां और शारीरिक परीक्षा
जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन करना कोई आसान काम नहीं है। मानसून की उमस, पसीने की दुर्गंध और बुनियादी सुविधाओं की कमी के बीच वांगचुक का अडिग रहना उनके मानसिक और शारीरिक साहस की कड़ी परीक्षा है। दिल्ली उच्च न्यायालय ने भी उनके गिरते स्वास्थ्य को देखते हुए केंद्र और दिल्ली सरकार को तत्काल चिकित्सा सहायता प्रदान करने का नोटिस जारी किया है। याचिकाकर्ताओं ने उनकी स्थिति को देश के सामने 'आत्महत्या' करने जैसा बताया है, जो स्थिति की गंभीरता को रेखांकित करता है।
क्या वांगचुक को अपना अनशन समाप्त कर देना चाहिए?
राजनीतिक विश्लेषकों और नागरिक समाज का मानना है कि वांगचुक ने अपने इस अनशन के माध्यम से देश का ध्यान आकर्षित करने का अपना मुख्य उद्देश्य पहले ही प्राप्त कर लिया है। यदि वे अब अपने स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए अनशन समाप्त भी करते हैं, तो भी इस आंदोलन की धार कम नहीं होगी। उन्होंने अपने समर्थकों से अपील की है कि वे उन्हें अनशन तोड़ने के लिए कहने के बजाय 20 जुलाई को होने वाले शांतिपूर्ण 'संसद मार्च' में शामिल हों।
निष्कर्ष और भविष्य की राह
सोनम वांगचुक अब इस आंदोलन का एक ऐसा चेहरा बन चुके हैं जिसे नजरअंदाज करना सरकार के लिए नामुमकिन होगा। आंदोलन ने अपनी गति पकड़ ली है और यह अब केवल वांगचुक के उपवास पर निर्भर नहीं है। देश के बुद्धिजीवियों, कलाकारों और राजनेताओं ने भी उनसे अपना जीवन बचाने की अपील की है, क्योंकि व्यवस्था में सुधार के लिए उनका जीवित और सक्रिय रहना बेहद जरूरी है।