तेलंगाना उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को एक महिला लेक्चरर को उसकी दूसरी गर्भावस्था के लिए 180 दिनों का मातृत्व अवकाश देने का निर्देश दिया है। अधिकारियों ने पहली डिलीवरी में जुड़वां बच्चे होने के कारण छुट्टी देने से इनकार कर दिया था, जिसे कोर्ट ने असंवैधानिक करार दिया।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- तेलंगाना हाईकोर्ट ने लेक्चरर की दूसरी गर्भावस्था के लिए 180 दिनों के मातृत्व अवकाश को मंजूरी दी।
- प्रशासन ने पहली गर्भावस्था से हुए जुड़वां बच्चों को दो अलग बच्चे मानकर छुट्टी देने से इनकार कर दिया था।
- जस्टिस के. सरथ ने फैसला सुनाया कि जुड़वां बच्चे होना एक जैविक घटना है और छुट्टी न देना अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन है।
महिला अधिकारों और श्रम कल्याण के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए, तेलंगाना उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को एक महिला जूनियर लेक्चरर को उसकी दूसरी गर्भावस्था के लिए 180 दिनों का मातृत्व अवकाश (मैटर्निटी लीव) प्रदान करने का आदेश दिया है। इस मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस के. सरथ ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता छुट्टी की अवधि के दौरान पूर्ण वेतन और भत्तों की हकदार है। अदालत ने उस प्रशासनिक अड़ंगे को पूरी तरह खारिज कर दिया, जो पहली गर्भावस्था में जुड़वां बच्चों को जन्म देने के कारण महिला को मातृत्व लाभ से वंचित कर रहा था।
क्या था पूरा विवाद?
विवाद तब शुरू हुआ जब लेक्चरर ने अपनी दूसरी गर्भावस्था के लिए मातृत्व अवकाश का आवेदन किया। राज्य के अधिकारियों ने "दो-बच्चे के नियम" का हवाला देते हुए उनके आवेदन को खारिज कर दिया। चूंकि महिला ने 9 नवंबर, 2023 को अपनी पहली गर्भावस्था के दौरान जुड़वां बच्चों को जन्म दिया था, इसलिए प्रशासन ने उन्हें दो अलग-अलग बच्चे माना और तर्क दिया कि वह पहले ही अपनी पात्रता सीमा पार कर चुकी हैं। इस मनमाने फैसले को चुनौती देते हुए, लेक्चरर ने उच्च न्यायालय का रुख किया और तर्क दिया कि जुड़वां बच्चों का जन्म एक प्राकृतिक और जैविक घटना है, जिस पर किसी का नियंत्रण नहीं होता।
संवैधानिक उल्लंघन और कानूनी मिसालें
याचिकाकर्ता ने कोर्ट के समक्ष दलील दी कि पहली गर्भावस्था में जुड़वां बच्चों के आधार पर दूसरी गर्भावस्था के लिए मातृत्व अवकाश से इनकार करना भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) का सीधा उल्लंघन है। इस तर्क से सहमति जताते हुए, जस्टिस सरथ ने जोर देकर कहा कि मातृत्व अवकाश अनुच्छेद 21 के तहत एक मौलिक अधिकार है। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के एक पुराने फैसले का भी हवाला दिया, जिसमें पहली शादी से दो जीवित बच्चे होने के बावजूद दूसरी शादी से होने वाले पहले बच्चे के लिए मातृत्व अवकाश को वैध माना गया था।
पड़ोसी राज्यों की प्रगतिशील नीतियां
अपने फैसले को और मजबूती देने के लिए, हाईकोर्ट ने पड़ोसी राज्यों की प्रगतिशील नीतियों का उल्लेख किया। तमिलनाडु सरकार ने मद्रास हाईकोर्ट के जे. शर्मिला मामले में आए फैसले के बाद अपने सेवा नियमों में संशोधन किया था, जिसमें कहा गया था कि यदि किसी महिला सरकारी कर्मचारी को पहली डिलीवरी में जुड़वां बच्चे होते हैं, तो वह अगली डिलीवरी के लिए भी मातृत्व अवकाश की हकदार होगी। इसके अलावा, आंध्र प्रदेश के विभाजन के बाद अवशिष्ट राज्य आंध्र प्रदेश ने भी इसी तरह के नीतिगत बदलाव किए थे।
फैसले का दूरगामी प्रभाव
यह फैसला पूरे देश में एक महत्वपूर्ण कानूनी मिसाल कायम करता है, जहां अक्सर पुराने और संकीर्ण प्रशासनिक नियम जैविक वास्तविकताओं और संवैधानिक गारंटियों से टकराते हैं। यह स्वीकार करते हुए कि एक एकल गर्भावस्था की घटना—चाहे उसमें कितने भी बच्चे पैदा हों—महिला के ठीक होने और बच्चे की देखभाल करने के अधिकार को सीमित नहीं कर सकती, तेलंगाना हाईकोर्ट ने मातृत्व लाभ अधिनियम की मानवीय भावना को पुनर्जीवित किया है। यह फैसला सभी प्रशासनिक निकायों को महिलाओं के स्वास्थ्य और रोजगार अधिकारों के प्रति अधिक संवेदनशील बनने का संदेश देता है।