महाराष्ट्र सरकार ने बॉम्बे हाईकोर्ट में दलील दी है कि जब तक प्लास्टर ऑफ पेरिस (PoP) के पुनर्चक्रण का स्थायी समाधान नहीं मिल जाता, तब तक 6 फीट से बड़ी मूर्तियों को प्राकृतिक जल निकायों में विसर्जित करने की अनुमति दी जानी चाहिए।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- महाराष्ट्र सरकार ने 6 फीट से अधिक ऊँची PoP मूर्तियों के प्राकृतिक जल निकायों में विसर्जन के लिए हाईकोर्ट से अनुमति मांगी है।
- सरकार का तर्क है कि CPCB के 2020 के दिशा-निर्देश केवल परामर्शदात्मक हैं, प्रतिबंधात्मक नहीं।
- राज्य सरकार PoP के पुनर्चक्रण (Recycling) के लिए एक दीर्घकालिक समाधान खोजने पर काम कर रही है।
- पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने प्रदूषण का हवाला देते हुए बड़े PoP विसर्जन पर पूर्ण प्रतिबंध की मांग की है।
आगामी गणेशोत्सव के त्योहार से ठीक पहले, महाराष्ट्र सरकार ने एक महत्वपूर्ण कानूनी कदम उठाया है। राज्य सरकार ने बॉम्बे हाईकोर्ट में दलील दी है कि 6 फीट से अधिक ऊंचाई वाली प्लास्टर ऑफ पेरिस (PoP) की मूर्तियों को प्राकृतिक जल निकायों, जैसे नदियों और समुद्र में विसर्जित करने की अनुमति दी जानी चाहिए। सरकार का कहना है कि जब तक PoP सामग्री के पुनर्चक्रण (Recycling) के लिए कोई ठोस और दीर्घकालिक समाधान नहीं मिल जाता, तब तक मौजूदा नियमों के तहत ढील दी जानी चाहिए।
कानूनी तर्क और CPCB के दिशा-निर्देश
अदालत में दायर हलफनामे में, पर्यावरण विभाग के संयुक्त सचिव रमेश महाले ने स्पष्ट किया कि केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के 2020 के दिशा-निर्देश केवल 'परामर्शदात्मक' (Advisory) हैं, न कि 'प्रतिबंधात्मक' (Prohibitory)। सरकार ने उस जनहित याचिका (PIL) का विरोध किया है जिसमें झीलों, नदियों और समुद्र में बड़े PoP विसर्जन पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की मांग की गई है। राज्य का तर्क है कि गणेशोत्सव महाराष्ट्र की एक अनमोल सांस्कृतिक विरासत है और सरकार पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ परंपराओं के सम्मान के बीच संतुलन बनाने का प्रयास कर रही है।
पर्यावरण बनाम परंपरा: एक जटिल संघर्ष
दूसरी ओर, याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मिहिर देसाई ने तर्क दिया कि बड़े PoP विसर्जन से जल प्रदूषण की समस्या गंभीर रूप से बढ़ रही है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि CPCB के दिशा-निर्देशों का कार्यान्वयन ठीक से नहीं हो रहा है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि सार्वजनिक गणेश मंडलों द्वारा स्थापित विशाल मूर्तियां जल निकायों के पारिस्थितिकी तंत्र को भारी नुकसान पहुँचाती हैं।
राज्य सरकार की प्रस्तावित रणनीति
सरकार ने अदालत को बताया कि 1 अगस्त, 2025 के दिशा-निर्देशों के अनुसार, 6 फीट से अधिक की मूर्तियों का विसर्जन केवल वहीं किया जा सकता है जहाँ कोई वैकल्पिक विसर्जन सुविधा उपलब्ध न हो। ऐसी स्थिति में, विसर्जन के बाद सामग्री को एकत्र करना, उसका वैज्ञानिक निपटान करना और जल निकाय की सफाई करना अनिवार्य होगा। सरकार का दावा है कि वे धीरे-धीरे नागरिकों को पर्यावरण के अनुकूल (Eco-friendly) मूर्तियों को अपनाने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं, जिससे PoP के उपयोग में कमी आई है।