बॉम्बे हाई कोर्ट ने अपनी ही बेटी के साथ यौन शोषण करने वाले पिता की उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा है। अदालत ने इसे भरोसे का घोर उल्लंघन और समाज के लिए एक शर्मनाक अपराध बताया है।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- बॉम्बे हाई कोर्ट ने POCSO एक्ट के तहत दोषी पिता की उम्रकैद की सजा को सही ठहराया।
- अदालत ने कहा कि पिता ने न केवल शारीरिक बल्कि बच्ची के मानसिक स्वास्थ्य को भी स्थायी रूप से नष्ट कर दिया है।
- DNA परीक्षण ने अपराधी के अपराध को पुख्ता किया, जिससे दोष सिद्ध हुआ।
- न्यायालय ने जोर दिया कि यौन शोषण केवल शारीरिक हमला नहीं, बल्कि व्यक्तित्व का विनाश है।
बॉम्बे हाई कोर्ट ने एक अत्यंत संवेदनशील और हृदयविदारक मामले में अपना कड़ा रुख अपनाते हुए, अपनी ही बेटी के साथ यौन शोषण करने वाले एक पिता की उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा है। न्यायमूर्ति उर्मिला जोशी फालके और न्यायमूर्ति निवेदिता पी. मेहता की पीठ ने अपने फैसले में कहा कि एक पिता द्वारा अपनी संतान के साथ किया गया ऐसा अपराध समाज के नैतिक ताने-बाने पर एक गहरा प्रहार है।
भरोसे का कत्ल और मानसिक आघात
अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा, "एक बेटी अपने पिता की गोद में बड़ी तो हो सकती है, लेकिन वह कभी उनके दिल में बड़ी नहीं होती।" अदालत ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि आरोपी, जो कि बच्ची का रक्षक होना चाहिए था, उसने ही उसके विश्वास को तोड़ा और उसके भविष्य को अंधकारमय कर दिया। न्यायाधीशों ने माना कि यौन शोषण केवल एक शारीरिक हमला नहीं है, बल्कि यह पीड़ित के संपूर्ण व्यक्तित्व को नष्ट कर देने वाला कृत्य है, जिससे उसे जीवनभर के लिए मानसिक और मनोवैज्ञानिक घाव मिलते हैं।
मामले की पृष्ठभूमि और जांच
यह मामला अप्रैल 2021 का है, जब एक आशा कार्यकर्ता ने एक ग्रामीण क्षेत्र में सर्वेक्षण के दौरान एक बच्ची को पाया जो गर्भवती प्रतीत हो रही थी। जांच के बाद जब अस्पताल में परीक्षण किया गया, तो पता चला कि बच्ची 27 सप्ताह की गर्भवती थी। पुलिस जांच में संदेह की सुई पिता की ओर घूमी। जब जांच के दौरान बच्ची ने एक बच्चे को जन्म दिया, तो DNA परीक्षण के माध्यम से यह साबित हो गया कि बच्चा आरोपी पिता का ही है।
कानूनी कार्यवाही और फैसला
आरोपी को POCSO (यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण) अधिनियम, 2012 और भारतीय दंड संहिता (IPC) की प्रासंगिक धाराओं के तहत 'गंभीर यौन शोषण' का दोषी पाया गया था। बचाव पक्ष के वकील ने DNA रिपोर्ट की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए और आरोप लगाया कि बच्ची ने पिता को गलत तरीके से फंसाया है, लेकिन अदालत ने राज्य के अभियोजक के तर्कों को स्वीकार करते हुए कहा कि साक्ष्यों की कड़ी पूरी तरह से पुख्ता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि अपराधी ने अपनी स्थिति और शक्ति का दुरुपयोग कर एक मासूम का शोषण किया है।