कर्नाटक उच्च न्यायालय ने बेंगलुरु के महत्वाकांक्षी टनल रोड प्रोजेक्ट पर महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए हैं। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि सरकार द्वारा किए गए किसी भी अनुबंध का परिणाम जनहित याचिकाओं (PIL) के फैसले पर निर्भर करेगा।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • कर्नाटक हाईकोर्ट ने टनल रोड प्रोजेक्ट के लिए किए जाने वाले किसी भी तीसरे पक्ष के अनुबंध को अदालती सुनवाई के अधीन कर दिया है।
  • तीन जनहित याचिकाओं (PIL) में प्रोजेक्ट की वैधानिकता और मंजूरी की प्रक्रिया को चुनौती दी गई है।
  • कोर्ट ने सरकार को निर्देश दिया है कि वह ठेकेदारों को लिखित में सूचित करे कि अनुबंध अंतिम अदालती फैसले के अधीन होंगे।
  • BMLTA नियमों के नए संशोधन (नियम 24) को भी कानूनी चुनौती दी गई है।

बेंगलुरु में प्रस्तावित महत्वाकांक्षी टनल रोड प्रोजेक्ट वर्तमान में एक बड़े कानूनी संकट के घेरे में है। कर्नाटक उच्च न्यायालय ने गुरुवार को एक महत्वपूर्ण अंतरिम आदेश पारित करते हुए कहा कि राज्य सरकार या उसकी एजेंसियों द्वारा इस प्रोजेक्ट के लिए किसी भी तीसरे पक्ष के साथ किया गया कोई भी समझौता या अनुबंध, लंबित जनहित याचिकाओं (PIL) के अंतिम निर्णय के अधीन होगा।

न्यायालय की सख्त टिप्पणी और निर्देश

मुख्य न्यायाधीश विभु बाखरु और न्यायमूर्ति के.एस. हेमालेखा की खंडपीठ ने यह आदेश तब दिया जब याचिकाकर्ताओं के वकीलों ने आशंका जताई कि सरकार जल्द ही कार्य आदेश (work orders) जारी कर सकती है। अदालत ने स्पष्ट रूप से निर्देश दिया है कि सरकार को ठेकेदारों को लिखित रूप में यह सूचित करना होगा कि उनके अनुबंधों की वैधता अदालत के अंतिम फैसले पर टिकी है।

प्रोजेक्ट की वैधता पर सवाल

यह कानूनी लड़ाई अदिकेसावलु रवींद्र, प्रकाश बेलवाडी और सिटिजन्स एक्शन फोरम, बेंगलुरु द्वारा दायर तीन अलग-अलग याचिकाओं पर आधारित है। इन याचिकाओं में प्रोजेक्ट की मंजूरी की कानूनी प्रक्रिया और तकनीकी पहलुओं को चुनौती दी गई है। हालांकि, सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने स्पष्ट किया कि अदालत का ध्यान केवल प्रोजेक्ट की मंजूरी में हुई प्रक्रियात्मक या कानूनी खामियों की जांच करने पर होगा, न कि यातायात समाधान की आवश्यकता पर।

BMLTA नियमों को भी चुनौती

प्रोजेक्ट के अलावा, अदालत ने बेंगलुरु मेट्रोपॉलिटन लैंड ट्रांसपोर्ट अथॉरिटी (BMLTA) के नए नियमों, विशेष रूप से नियम 24 की वैधता को चुनौती देने वाली एक अन्य याचिका पर भी सरकार को नोटिस जारी किया है। याचिकाकर्ता का आरोप है कि यह नया नियम बिना किसी स्वतंत्र वैधानिक मूल्यांकन के पिछले तीन वर्षों के बड़े शहरी गतिशीलता निर्णयों और 1 लाख करोड़ रुपये से अधिक के प्रोजेक्ट्स को वैध बनाने का प्रयास कर रहा है।