नवोदित लेखक ज़ह्यिन जेम्स की प्रथम कृति ‘द कीपर ऑफ द वेल्स’ में एंग्लो‑इंडियन परिवार की विरासत को मद्रास के सात कुओँ पड़ोस से गहराई से जोड़ दिया गया है। यह कहानी ईस्ट इंडिया कंपनी की जल आपूर्ति से लेकर परिवार की पीढ़ी‑दर‑पीढ़ी की भूमिका तक को उजागर करती है।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • सात कुओँ का इतिहास ईस्ट इंडिया कंपनी के जल प्रबंधन से जुड़ा है।
  • ज़ह्यिन जेम्स ने अपने पारिवारिक दास्ताने को उपन्यास में जीवंत किया।
  • एंग्लो‑इंडियन समुदाय की सांस्कृतिक पहचान को नई पीढ़ी ने पुनः खोजा।

जुलाई की धूप में, विक्टोरिया पब्लिक हॉल की रोमन शैली की इमारत के पास पक्षी‑ऑफ़‑पैरडाइस की कतारों में चलते हुए, लेखक ज़ह्यिन जेम्स ने अपने उपन्यास ‘द कीपर ऑफ द वेल्स’ के शुरुआती पन्नों का दृश्य देखा। यह वही स्थान है जहाँ उनका परिवार का इतिहास, सात कुओँ पड़ोस, और ईस्ट इंडिया कंपनी के जल‑संकल्प की कहानी आपस में जुड़ती है।

इतिहास की जड़ें: सात कुओँ और ईस्ट इंडिया कंपनी

सात कुओँ, उत्तर मद्रास में स्थित, 18वीं सदी के अंत में फ़ोर्ट सेंट जॉर्ज को ताज़ा पानी पहुँचाने के लिए खोदे गये थे। यह ब्रिटिश भारत में पहली पाइप्ड जल आपूर्ति प्रणाली का प्रारम्भ था, जिसका संचालन कंपनी के एक आयरिश अधिकारी जॉन निकोलस को सौंपा गया। उनका वंशज, बाद में निकोलस परिवार, को “कस्टोडियन ऑफ़ द सेवन वेल्स” का शीर्षक मिला, जो 125 वर्षों तक जारी रहा।

जेनरल जेम्स की व्यक्तिगत खोज

चेंनई के अडंबक्कम में पले‑बढ़े ज़ह्यिन, जिसका पेशा लैंडस्केप आर्किटेक्ट और वन्यजीव फोटोग्राफर है, ने बचपन में अपने दादा‑दादी से सुनाई गई कहानियों को फिर से जीवंत करने का संकल्प लिया। अपने 50वें जन्मदिन से पहले उपन्यास लिखने का लक्ष्य, तीन प्रमुख घटनाओं से प्रेरित था: इतिहासकार एस. मूथिया से मिलना, निकोलस परिवार के वैध दस्तावेज़ों की खोज, और पत्नी वैशाली का निरंतर समर्थन।

उपन्यास का सामाजिक‑सांस्कृतिक प्रभाव

‘द कीपर ऑफ द वेल्स’ न केवल एक काल्पनिक परिवार कथा है, बल्कि यह एंग्लो‑इंडियन समुदाय की पहचान, उनकी अनूठी संस्कृति, और मद्रास की शहरी विरासत को पुनः स्थापित करने का प्रयास है। लॉन्च कार्यक्रम में इतिहासकार एस. शिराम ने कहा, “ऐसी पुस्तकें तथ्य‑और‑कथा के मिश्रण से इतिहास को रोमांटिक बनाती हैं, जिससे युवा पाठकों की रुचि जगती है।” इस प्रकार उपन्यास ने स्थानीय इतिहास को नई पीढ़ी के बीच लोकप्रिय बनाने का काम किया।

भविष्य की दिशा

ज़ह्यिन के कार्य से यह स्पष्ट होता है कि व्यक्तिगत विरासत को सार्वजनिक इतिहास में सम्मिलित करने से सामाजिक स्मृति को संरक्षित किया जा सकता है। सात कुओँ की कहानी अब केवल एक ऐतिहासिक तथ्य नहीं, बल्कि एंग्लो‑इंडियन समाज की जीवंत स्मृति है, जो भविष्य में भी संरक्षण और अध्ययन का विषय बनी रहेगी।