कोटा जिला प्रशासन ने पाँच माताओं को मुफ्त इलाज, प्राथमिक डायलिसिस और तेज़ किडनी ट्रांसप्लांट के साथ ₹2 लाख की आर्थिक सहायता देने का आश्वासन दिया। यह कदम हालिया मातृ स्वास्थ्य संकट के जवाब में उठाया गया है, जिसमें कई महिलाएँ सी‑सेक्शन के बाद किडनी समस्याओं से जूझ रही थीं।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • मुक्त उपचार, प्राथमिक डायलिसिस और किडनी ट्रांसप्लांट की गारंटी
  • प्रत्येक रोगी को ₹2 लाख की वित्तीय सहायता
  • कडावर किडनी ट्रांसप्लांट सूची में प्राथमिकता

कोटा जिला प्रशासन और सरकारी मेडिकल कॉलेज ने गुरुवार को पाँच माताओं के परिवारों के साथ एक लिखित समझौता किया, जिनमें सी‑सेक्शन के बाद किडनी फेल्योर विकसित हो गया था। यह समझौता प्रधानाचार्य एवं कंट्रोलर डॉ. निलेश कुमार जैन, अतिरिक्त जिला कलेक्टर विनोद कुमार मल्होत्रा और नेफ्रोलॉजी प्रमुख डॉ. विकास खंडेलिया की अध्यक्षता में हुआ।

पृष्ठभूमि और संकट का विस्तार

मई के मध्य में कोटा के न्यू मेडिकल कॉलेज में सी‑सेक्शन करवाने वाली पाँच महिलाओं ने दो महीने बाद किडनी फेल्योर की जटिलता का सामना किया। अस्पताल में भर्ती रहने के दौरान उन्होंने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से तत्काल ऑर्गन ट्रांसप्लांट की माँग की, अन्यथा “इयूथेनिया” का अनुरोध किया। यह अपील मीडिया में आई और तुरंत प्रशासनिक प्रतिक्रिया को प्रेरित किया।

समझौते के प्रमुख बिंदु

समझौते के अनुसार, सभी डायलिसिस और संबंधित उपचार मुफ्त में, प्राथमिकता के साथ प्रदान किए जाएंगे। यदि परिवार में जीवित दाता उपलब्ध हो तो ट्रांसप्लांट भी शीघ्रता से, बिना किसी लागत के किया जाएगा। अतिरिक्त रूप से, रोगियों को कडावर (cadaver) किडनी ट्रांसप्लांट सूची में प्राथमिकता दी जाएगी, और आवश्यक होने पर राजस्थान के किसी भी सरकारी अस्पताल, जैसे एआईआईएमएस जोधपुर, में मुफ्त में ऑपरेशन करवाया जा सकेगा।

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का हस्तक्षेप

इसी दौरान, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने राजस्थान सरकार को नोटिस जारी किया, क्योंकि कई महिलाओं और एक नाबालिग की मृत्यु सरकार के अस्पतालों में गाइनकोलॉजी विभाग में हुई सर्जरी के बाद हुई थी। आयोग ने दो हफ्ते में विस्तृत रिपोर्ट की मांग की, जिससे इस व्यापक स्वास्थ्य समस्या की जाँच सुनिश्चित हो सके।

भविष्य के प्रभाव और आवश्यक कदम

यह पहल तत्काल राहत प्रदान करती है, परन्तु विशेषज्ञों का मानना है कि दीर्घकालिक समाधान के लिए प्रसवपूर्व देखभाल, संक्रमण नियंत्रण, और किडनी स्वास्थ्य की निरंतर निगरानी आवश्यक है। यदि इस प्रकार की नीतियों को राज्य भर में लागू किया जाए, तो भविष्य में मातृ मृत्यु और गंभीर जटिलताओं को काफी हद तक रोका जा सकता है।