कर्नाटक राज्य पर्यटन विकास निगम (KSTDC) बैनरघट्टा बायोलॉजिकल पार्क में सफारी संचालन के लिए 40 नई इलेक्ट्रिक बसों को तैनात करने की संभावनाओं की जांच कर रहा है। यह कदम कार्बन उत्सर्जन घटाने, शोर प्रदूषण कम करने और डीजल की लागत में दीर्घकालिक बचत का लक्ष्य रखता है।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- KSTDC 40 इलेक्ट्रिक बसों को बैनरघट्टा सफारी में लाने की तैयारी में है
- इलेक्ट्रिक बसें कार्बन उत्सर्जन और शोर प्रदूषण को कम करेंगी
- पर्यटन में फॉसिल ईंधन पर निर्भरता घटाने की दिशा में कदम
कर्नाटक राज्य पर्यटन विकास निगम (KSTDC) ने बैनरघट्टा बायोलॉजिकल पार्क (BBP) में सफारी संचालन के लिए 40 इलेक्ट्रिक बसों को जोड़ने की संभावनाओं का अध्ययन शुरू कर दिया है। वर्तमान में पार्क में 35 डीजल बसें, विभिन्न क्षमता वाली एसी व नॉन‑एसी जीपें और पाँच चार‑सीटर इलेक्ट्रिक वाहन उपयोग में हैं।
पर्यावरणीय लाभ और लागत में कमी
कर्मचारियों के अनुसार, इलेक्ट्रिक बसों से न केवल कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में उल्लेखनीय कमी आएगी, बल्कि शोर प्रदूषण भी घटेगा। लम्बी अवधि में 35 मौजूदा डीजल बसों की तुलना में ईंधन खर्च में भारी बचत की उम्मीद है, जिससे राज्य के पर्यटन विभाग की वित्तीय स्थिरता मजबूत होगी।
सरकारी अधिकारी की टिप्पणी
पर्यटन विभाग के सचिव और KSTDC के निदेशक त्रिलोचन चंद्र ने कहा, “BBP की सफारी प्रमुख आकर्षण है, इसलिए हम एसी इलेक्ट्रिक बसों को शामिल करने की संभावना का मूल्यांकन कर रहे हैं। विस्तृत अध्ययन के बाद टेंडर जारी किया जाएगा, जिससे 70 % स्वच्छ ऊर्जा उपयोग को बढ़ावा मिलेगा।” उन्होंने डीजल की बढ़ती कीमतों को भी उजागर किया और कहा, “पर्यटन क्षेत्र में जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता को घटाना हमारा प्रमुख लक्ष्य है।”
पायलट परियोजना का अनुभव
2025 में वन विभाग ने 22‑सीटर एसी इलेक्ट्रिक बस को 100 kWh बैटरी के साथ पायलट रूप में लॉन्च किया था, जो 60 किमी तक चलती और दो घंटे की चार्जिंग पर आठ यात्रा पूरी करती। तकनीकी समस्याओं के कारण यह बस फिर से उपयोग में नहीं लाई गई, जिससे डीजल बसों पर निर्भरता बनी रही।
स्थानीय स्तर पर उपलब्ध इन्फ्रास्ट्रक्चर
बैनरघट्टा बायोलॉजिकल पार्क के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि उन्होंने चार‑सीटर इलेक्ट्रिक वाहनों को खरीदा है, और दो और बसें जोड़ने की योजना बना रहे हैं। पार्क के भीतर स्थापित चार्जिंग स्टेशन इन वाहनों को चार से छह घंटे तक चलाने की सुविधा देता है।
यदि यह पहल सफल रहती है, तो यह न केवल कर्नाटक में सतत पर्यटन का मॉडल स्थापित करेगी, बल्कि भारत के अन्य वन्यजीव अभयारण्यों के लिए भी एक प्रेरणा बन सकती है।