कुर्नाटक विकास प्राधिकरण (KDA) की अध्यक्ष पुरीशोत्तम बिलिमाले की अध्यक्षता वाली समिति ने राज्य गान में बौद्ध शब्द को फिर से जोड़ने की सिफ़ारिश की है। यह कदम कवि कुलेम्पु के मूल मसौदे का सम्मान करते हुए धर्मिक समावेशिता को बढ़ावा देगा।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • बौद्ध शब्द को राज्य गान में फिर से जोड़ने की सलाह
  • कुलेम्पु के मूल मसौदे में शब्द मौजूद था
  • अंतिम निर्णय सरकार पर निर्भर

कर्नाटक के राज्य गान नाडा गीते में हाल ही में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन का प्रस्ताव आया है। पुरीशोत्तम बिलिमाले, जो कन्नड़ विकास प्राधिकरण (KDA) के अध्यक्ष हैं, ने अध्यक्षता की समिति से यह सिफ़ारिश की है कि गान के शब्दों में ‘बौद्ध’ शब्द को पुनः सम्मिलित किया जाए। यह शब्द मूल रूप से कवि कुलेम्पु द्वारा 1924 में लिखे गए प्रारम्भिक मसौदे में मौजूद था, परन्तु 1930 में प्रकाशित संग्रह कोलालु में इसे हटाया गया।

पृष्ठभूमि और ऐतिहासिक संदर्भ

कुलेम्पु का ‘नाडा गीते’ कर्नाटक की सांस्कृतिक पहचान का एक प्रमुख स्तम्भ है, जिसमें विभिन्न धार्मिक और सामाजिक तत्वों को समाहित किया गया है। ‘बौद्ध’ शब्द को हटाने के बाद कई बौद्ध धार्मिक संस्थानों और सामाजिक संगठनों ने इस बदलाव को उलटने की मांग की। वे तर्क देते हैं कि बौद्ध धर्म कर्नाटक के इतिहास में एशोक काल के बौद्ध स्तूपों और सन्नाती जैसे स्थानों पर स्पष्ट रूप से दिखता है, जिससे यह धर्म राज्य की विरासत का अभिन्न हिस्सा बनता है।

समिति की प्रक्रिया और निष्कर्ष

राज्य सरकार ने इस मुद्दे को गंभीरता से लेते हुए एक विशेषज्ञ समिति गठित की, जिसका कार्य शब्दावली की प्रामाणिकता और सामाजिक प्रभाव का अध्ययन करना था। समिति ने सभी पक्षों की सुनवाई के बाद सर्वसम्मति से ‘बौद्ध’ शब्द को पुनः सम्मिलित करने की सिफ़ारिश की। रिपोर्ट में नाडा गीते के वर्तमान पंक्तियों “Parasika Jainarudhyana” को “Parasika Jaina Baudharudhyana” में बदलने का प्रस्ताव दिया गया है।

राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव

यह सिफ़ारिश केवल एक शब्द परिवर्तन से अधिक है; यह कर्नाटक की बहु-सांस्कृतिक पहचान को सुदृढ़ करने की दिशा में एक स्पष्ट संकेत है। पिछले वर्ष, सामाजिक कल्याण मंत्री एच.सी. महादेवप्पा ने मुख्यमंत्री सिद्धरमैया को लिखित पत्र में बताया था कि मूल मसौदे में ‘बौद्ध’ शब्द था। इसी तरह, ‘माधवा’ शब्द को पहले जोड़ने के विवाद ने भी यह दिखाया कि राज्य गान में धर्म‑सम्बन्धी शब्दों का समावेश संवेदनशील मुद्दा बन सकता है।

आगे का मार्ग

समिति की रिपोर्ट कन्नड़ एवं संस्कृति विभाग को भेजी जा चुकी है, और अंतिम निर्णय राज्य सरकार के हाथ में है। यदि यह परिवर्तन लागू होता है, तो यह कर्नाटक के सांस्कृतिक परिदृश्य में एक नई परत जोड़ देगा, जिससे सभी धर्मों के अनुयायियों को समान मान्यता मिलेगी।