चेंनई में आयोजित 150वें वर्षगाँठ समारोह में तमिल भाषा के भविष्य को सुरक्षित रखने की प्रतिबद्धता को दोहराया गया। राज्य सरकार ने उनके सम्मान में पुल और नगर का नामकरण किया, जबकि नेताओं ने भाषा नीति पर चर्चा की।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • मैराइलाइ आदिगर के 150वें जन्मजयंती समारोह में तमिल भाषा संरक्षण पर बल दिया गया।
  • राज्य सरकार ने उनके सम्मान में पुल और मारै मालै नगर का नामकरण किया।
  • नेताओं ने हिंदी थोपने के खिलाफ आवाज़ उठाते हुए तमिल नामकरण आंदोलन की प्रशंसा की।

चेंनई में बुधवार को आयोजित 150वें जन्मजयंती समारोह में विश्व तमिल आराइची मंड्रम और मारै मालै आदिगर कलवी अरकट्टलै के सहयोग से तमिल भाषा के भविष्य को सुरक्षित रखने की प्रतिबद्धता को दोहराया गया। तमिल भाषा के शैक्षिक मंत्री राजमोहन ने कहा, "जैसे ही तमिल भाषा अस्तित्व में रहेगी, मैराइलाइ आदिगर का नाम जीवित रहेगा।" उन्होंने यह भी बताया कि आदिगर के पल्लवारम स्थित घर की लाइब्रेरी में उन्होंने तमिल भाषा सीखी थी।

सरकारी सम्मान और सामाजिक योगदान

राज्य सरकार ने आदिगर की स्मृति में एक पुल का नामकरण किया और मारै मालै नगर की स्थापना की, जो अब बड़े औद्योगिक केंद्र के रूप में प्रसिद्ध है। इस पहल को वीआईटी विश्वविद्यालय के चांसलर के. विश्वनाथन ने सराहा, जिन्होंने कहा कि आदिगर ने बच्चों को तमिल नाम रखने की आंदोलन की शुरुआत की, जिसके तहत 55,000 से अधिक तमिल नाम उत्पन्न हुए।

भाषाई नीति पर विवाद

विश्वनाथन ने तमिल भाषा की रक्षा के साथ-साथ हिंदी थोपने की समस्या को भी उठाया। उन्होंने कहा, "अंग्रेजी कई राज्यों में आधिकारिक भाषा बन गई है, जबकि हिंदी केवल 12 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में प्राथमिक भाषा है, और 14 राज्यों में अंग्रेजी का प्रयोग अधिक है।" यह बयान राष्ट्रीय भाषा नीति पर एक व्यापक बहस को प्रेरित करता है।

राजनीतिक नेताओं की प्रतिक्रियाएँ

डेमोक्रेटिक पार्टी के नेता वैको ने कहा, "जब तक तमिल भाषा बोली जाती है, मैराइलाइ आदिगर को याद किया जाएगा।" उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि आदिगर युवा अवस्था में ही तमिल विद्वान थे और उन्होंने मनोनमनियाम सुंदरम पिल्लाई द्वारा लिखित "तमिज़ थाई वाज़्थु" में अपना विशेष स्थान बनाया। वैको ने आदिगर को डेमोक्रेटिक पार्टी के नेता अन्ना द्वारा चलाए गए हिंदी विरोध आंदोलन की प्रेरणा बताया।

भविष्य की दिशा

समारोह में उपस्थित मारै मालै आदिगर कलवी अरकट्टलै के संस्थापक और आदिगर के पोते थायुमानवन ने भाषाई विविधता को संरक्षित करने के महत्व पर बल दिया। उन्होंने कहा कि तमिल भाषा को केवल एक भाषा नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक पहचान के रूप में देखा जाना चाहिए, और इसके संरक्षण के लिए सभी स्तरों पर सहयोग आवश्यक है।