पालक्कड़ के युवक्षेत्र Institute of Management Studies (YIMS) में वाणिज्य विभाग ने दक्षिण भारतीय गायिका एस. जानकी को श्रद्धांजलि दी। उप‑प्राचार्य रिव. जोसेफ ओलिक्काल्कूनाल ने स्मरण व्याख्यान दिया, जबकि विभाग प्रमुख कीर्ती एम.एस. और छात्रों ने भावनात्मक शब्दों में उनकी विरासत को सम्मानित किया।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- YIMS ने एस. जानकी को श्रद्धांजलि दी
- उप‑प्राचार्य रिव. जोसेफ ओलिक्काल्कूनाल ने विशेष व्याख्यान दिया
- छात्रों ने गायिका की संगीत यात्रा पर पोर्ट्रेट प्रस्तुत किया
पलक्कड़ के युवक्षेत्र Institute of Management Studies (YIMS) के वाणिज्य विभाग ने 13 जुलाई, 2026 को दिग्गज दक्षिण भारतीय गायिका एस. जानकी को श्रद्धांजलि देने के लिए एक विशेष समारोह आयोजित किया। इस कार्यक्रम का उद्देश्य छात्रों में संगीत के इतिहास और सांस्कृतिक धरोहर के प्रति सम्मान को बढ़ावा देना था।
स्मरण व्याख्यान का मुख्य अंश
उप‑प्राचार्य रिव. जोसेफ ओलिक्काल्कूनाल ने एक प्रेरणादायक व्याख्यान दिया, जिसमें उन्होंने एस. जानकी के करियर के प्रमुख मोड़ों, उनकी आवाज़ की अनूठी पहचान और भारतीय संगीत उद्योग पर उनके दीर्घकालिक प्रभाव को उजागर किया। उन्होंने कहा, “उनकी आवाज़ केवल गाने नहीं, बल्कि सामाजिक बदलाव की आवाज़ भी रही है।”
छात्रों की भागीदारी और पोर्ट्रेट प्रदर्शन
वाणिज्य विभाग प्रमुख कीर्ती एम.एस. ने छात्रों को स्मरणीय पोर्ट्रेट तैयार करने के महत्व पर प्रकाश डाला। छात्र‑वर्ग ने एक विस्तृत पोर्ट्रेट तैयार किया, जिसमें एस. जानकी के विभिन्न चरणों में उनकी तस्वीरें, प्रमुख गानों के गीत और उनकी संगीत यात्रा के मुख्य बिंदु दर्शाए गए। इस पोर्ट्रेट को कार्यक्रम के अंत में मंच पर प्रदर्शित किया गया, जिससे सभी उपस्थित लोगों में गहरी भावनात्मक प्रतिक्रिया उत्पन्न हुई।
एस. जानकी का सांस्कृतिक महत्व
एस. जानकी, जिन्हें अक्सर “कर्नाटक की रानी” कहा जाता है, ने 50 से अधिक वर्षों में दक्षिण भारतीय फिल्म संगीत को नई दिशा दी। उन्होंने तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम और हिंदी सहित कई भाषाओं में 20,000 से अधिक গান गाए हैं। उनका योगदान न केवल संगीत के क्षेत्र में, बल्कि महिला सशक्तिकरण और सामाजिक समानता में भी महत्वपूर्ण रहा है।
भविष्य की दिशा
YIMS ने इस कार्यक्रम को वार्षिक रूप से जारी रखने की योजना बनाई है, जिससे छात्रों को सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने और उन्हें विविध कला रूपों की सराहना करने के अवसर मिलें। इस पहल से संस्थान की शैक्षणिक दृष्टि में सांस्कृतिक शिक्षा का महत्व स्पष्ट होता है, जो आज के वैश्विक परिप्रेक्ष्य में अत्यंत आवश्यक है।