भारतीय वास्तु संस्थाओं में महिलाओं की योगदान को अक्सर इतिहास में धुंधला कर दिया जाता है, चाहे वह 1930‑के दशक की पहली महिला वास्तुकार हों या आज की नई पीढ़ी। यह लेख इस प्रणालीगत बहिष्कार की जड़ें, कानूनी लड़ाइयों और संभावित सुधारों का विश्लेषण करता है।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- इतिहास में कई प्रमुख महिला वास्तुकारों को अनदेखा किया गया है।
- वर्तमान संस्थाओं में महिलाओं की पदोन्नति सीमित और असमान है।
- समान अवसर सुनिश्चित करने के लिए संरचनात्मक सुधार आवश्यक हैं।
भारतीय वास्तु जगत ने अक्सर अपने लैंगिक बहिष्कार को औपनिवेशिक अतीत तक सीमित करने की कोशिश की है, जबकि वास्तविकता में यह समस्या आज भी गहरी जड़ें जमा चुकी है। 1979 में स्थापित ज़ाहा हैदिड आर्किटेक्ट्स को हाल ही में अपने संस्थान के नाम से हैदिड का नाम हटाना पड़ा, जबकि वही संस्थान कई दशकों तक अपने नाम के तहत राजस्व का एक हिस्सा महिला की फाउंडेशन को देता रहा। यह मामला सिर्फ एक ब्रांड परिवर्तन नहीं, बल्कि एक कानूनी संघर्ष है जो दिखाता है कि कैसे महिलाओं के योगदान को व्यावसायिक लाभ के साथ ही सीमित किया जाता है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
1936 में पेरिन जामसेजी मिस्त्री ने भारत में पहली महिला आर्किटेक्ट के रूप में लाइसेंस प्राप्त किया, और दो महाद्वीपों में कई महत्वपूर्ण परियोजनाएँ संभालीं। फिर 1950 के दशक में उर्मिला “यूली” चौधरी ने ले कोर्बुज़िएर की टीम में अहम भूमिका निभाई, चंडीगढ़ के कई प्रमुख भवनों और फर्नीचर डिज़ाइन को तैयार किया। बावजूद इसके, इन महिलाओं के नाम अक्सर इतिहास की पुस्तकों से हटाए जा रहे हैं, जबकि उनके पुरुष समकालीनों को अक्सर प्रमुखता से उल्लेखित किया जाता है।
समकालीन संस्थागत बाधाएँ
हाल ही में, वास्तु परिषद (COA) में वंदना सेहगल ने 15‑14 के अंतर से अध्यक्ष पद के लिए एक वोट की कमी के कारण हार का सामना किया। यह 1972 में स्थापित परिषद के इतिहास में पहली बार था जब किसी महिला ने शीर्ष पद के करीब पहुंची। भारतीय संस्थान ऑफ आर्किटेक्ट्स (IIA) ने 2015 में केवल एक महिला, दिव्या कुश, को अध्यक्ष पद पर नियुक्त किया, और वह भी पाँच साल के छोटे कार्यकाल के साथ। इन आँकड़ों से स्पष्ट है कि संस्थागत संरचनाएँ अभी भी पुरुष‑प्रधान शक्ति संतुलन को बनाए रखती हैं।
भविष्य के लिए संभावित दिशा‑निर्देश
संस्थाओं को केवल "इतिहास बदल गया" कहकर पीछे हटना नहीं चाहिए। वास्तविक परिवर्तन के लिए, महिला आर्किटेक्टों के लिए स्पष्ट करियर‑लेडर, साझेदारी के अवसर, और नेतृत्व में प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करने वाली नीतियों की आवश्यकता है। समान शिक्षा दरों को स्वाभाविक रूप से पदों में समानता में परिवर्तित नहीं किया जा सकता; इसके लिए सक्रिय पहल और कानूनी ढाँचे की भी जरूरत होगी।
जैसे-जैसे भारत वैश्विक वास्तु मंच पर अपनी पहचान बना रहा है, यह अनिवार्य है कि इस पहचान में उन महिलाओं को भी शामिल किया जाए जिन्होंने इस क्षेत्र को आकार देने में अहम योगदान दिया है।