यूएस‑इरान शांति समझौते के बाद तीन हफ्तों में हॉर्मुज़ जलमार्ग के लिए 40% आवेदन भारत और चीन के जहाजों ने किए। यह डेटा दोनों देशों की ऊर्जा आयात पर निर्भरता और क्षेत्रीय तनाव को उजागर करता है।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- भारत और चीन ने हॉर्मुज़ जलमार्ग के लिए सबसे अधिक पारगमन आवेदन दर्ज किए
- लगभग 40% सभी आवेदन इन दो देशों के जहाजों से आए
- तेज़ बढ़ते तनाव के कारण समुद्री ट्रैफ़िक में उल्लेखनीय गिरावट देखी गई
हॉर्मुज़ जलमार्ग, जो वैश्विक तेल और एलएनजी के लगभग एक पाँचवें हिस्से को ले जाता है, मई‑जून 2026 में यूएस‑इरान के बीच हुए शांति समझौते (MoU) के बाद तीव्र रूप से निरीक्षण में आया। इरान द्वारा स्थापित पर्सियन गल्फ स्ट्रेट अथॉरिटी (PGSA) ने तीन हफ्तों में 200 से अधिक गैर‑इरानी जहाज़ों से पारगमन अनुमति और बीमा के लिए आवेदन प्राप्त किए। इनमें भारत और चीन के जहाज़ों का हिस्सा क्रमशः 20% और 21% रहा, जिससे वे कुल आवेदन में शीर्ष दो देशों बन गए।
पृष्ठभूमि और ऊर्जा निर्भरता
भारत की ऊर्जा आयात में पश्चिम एशिया पर अत्यधिक निर्भरता है: लगभग 40% कच्चे तेल, 60% एलएनजी और 90% एलपीजी इस जलमार्ग से आती हैं। चीन की भी समान ऊर्जा रणनीति है, जिससे दोनों देशों को हॉर्मुज़ की सुरक्षा और सुगमता पर विशेष ध्यान देना पड़ता है। इसलिए शिपिंग कंपनियों ने PGSA के निर्देशित मार्गों के तहत पारगमन की अनुमति मांगी, जबकि अमेरिकी नौसेना ने ओमान के साथ जलमार्ग को वैकल्पिक मार्ग के रूप में पेश किया।
क्षेत्रीय तनाव और ट्रैफ़िक में गिरावट
MoU के हस्ताक्षर के बाद कुछ हफ़्तों में तनाव फिर से बढ़ा, जिससे समुद्री ट्रैफ़िक में तेज गिरावट आई। Kpler और S&P Global के आंकड़े दर्शाते हैं कि 12 जुलाई को केवल 14 जहाज़ ने जलमार्ग पार किया, जो पिछले महीने के स्तर से भी कम है। इरान ने अभी भी जलमार्ग को आधिकारिक तौर पर बंद बताया है, जबकि PGSA ने अधिकांश आवेदन (79%) को मंजूरी दे दी और औसत प्रोसेसिंग समय 50 घंटे बताया।
भविष्य की संभावनाएँ और नीति प्रभाव
यदि क्षेत्र में स्थिरता नहीं आती, तो भारत और चीन को वैकल्पिक मार्गों, जैसे ओमान के किनारों के पास, अधिक भरोसा करना पड़ सकता है। इससे हॉर्मुज़ के रणनीतिक महत्व में कमी और वैश्विक तेल कीमतों में अस्थिरता संभावित है। साथ ही, इरान ने भविष्य में पारगमन शुल्क लागू करने का संकेत दिया है, जो व्यापार लागत को और बढ़ा सकता है।
समग्र रूप में, इस डेटा से स्पष्ट है कि भारत‑चीन ऊर्जा सुरक्षा के लिये हॉर्मुज़ जलमार्ग पर अत्यधिक निर्भर हैं, और इस निर्भरता को सुरक्षित करने के लिये दोनों देशों को कूटनीतिक और समुद्री सुरक्षा रणनीतियों को सुदृढ़ करना होगा।