सैफ अली खान ने साझा किया कि कैसे विशाल भारद्वाज ने उन्हें 'ओमकारा' के लिए चुना और क्यों उन्हें मुख्य भूमिका के बजाय 'लंगड़ा त्यागी' का किरदार दिया गया।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- सैफ अली खान को विशाल भारद्वाज ने 'दिल चाहता है' में उनके अभिनय के बाद चुना था।
- निर्देशक ने कहा था कि सैफ 'ओथेलो' के किरदार के लिए 'बहुत ज्यादा हैंडसम' हैं।
- सैफ को अजय देवगन के बजाय प्रतिष्ठित 'लंगड़ा त्यागी' की भूमिका मिली।
- फिल्म 'ओमकारा' के 20 साल पूरे होने पर सैफ ने ये दिलचस्प किस्से साझा किए।
बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता सैफ अली खान ने हाल ही में अपनी फिल्म 'ओमकारा' से जुड़ा एक बेहद दिलचस्प और अनसुना किस्सा साझा किया है। फिल्म के 20 साल पूरे होने के अवसर पर, सैफ ने बताया कि कैसे एक संयोग ने उनके करियर को एक नई दिशा दी। उन्होंने खुलासा किया कि उन्हें शुरुआत में फिल्म के मुख्य किरदार (ओथेलो) के लिए नहीं, बल्कि एक सहायक लेकिन बेहद प्रभावशाली भूमिका के लिए चुना गया था।
'आप बहुत ज्यादा हैंडसम हैं'
सैफ ने बताया कि जब निर्देशक विशाल भारद्वाज ने उन्हें फिल्म का प्रस्ताव दिया, तो उन्हें लगा कि शायद उन्हें मुख्य भूमिका मिल रही है। हालांकि, भारद्वाज का दृष्टिकोण अलग था। सैफ के शब्दों में, "जब मैंने पूछा कि क्या मैं ओथेलो बनूंगा, तो उन्होंने हंसते हुए कहा, 'नहीं, तुम ओथेलो खेलने के लिए बहुत ज्यादा हैंडसम हो।'" यह सुनकर सैफ हैरान रह गए, लेकिन इसके तुरंत बाद उन्हें 'लंगड़ा त्यागी' का वह यादगार किरदार ऑफर किया गया, जिसने उनके अभिनय की क्षमता को पूरी दुनिया के सामने साबित कर दिया।
'दिल चाहता है' का जादू और कास्टिंग का सच
विशाल भारद्वाज ने सैफ को इस भूमिका के लिए क्यों चुना? इसका जवाब भी दिलचस्प था। भारद्वाज ने बताया कि वे 'दिल चाहता है' में सैफ के प्रदर्शन से बेहद प्रभावित थे। उस फिल्म ने सैफ की छवि को एक 'कूल' अभिनेता से बदलकर एक गंभीर कलाकार के रूप में स्थापित करने में मदद की थी। इसी अभिनय कौशल ने उन्हें शेक्सपियर के क्लासिक नाटक 'ओथेलो' के भारतीय रूपांतरण का हिस्सा बनाया।
सेट पर हुआ एक मजेदार वाकया
सैफ ने सेट से जुड़ा एक और मजेदार अनुभव साझा करते हुए बताया कि विशाल भारद्वाज ने एक दृश्य को बिना कपड़ों के फिल्माने का सुझाव भी दिया था। हालांकि, सेट पर मौजूद भारी भीड़ और संकोच के कारण सैफ ने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया। उन्होंने मजाक में कहा कि यदि निर्देशक अकेले में निर्देश देते, तो वे शायद तैयार हो जाते। 'ओमकारा' आज भी हिंदी सिनेमा के इतिहास में एक मील का पत्थर मानी जाती है, जिसने कई कलाकारों के करियर को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया।